इस पुस्तक को लिखने का मूल उद्देश्य यह है कि हमारा आचरण शुद्ध, नैतिक एवं मर्यादित हो न कि हम धर्म के रीति-रिवाज़ों का अविवेकपूर्ण तरीके से पालन करते रहें | समस्या तब शुरू होती है जब हमारा आचरण शुद्ध नहीं होता है और हम हमारी धारणाओं एवं धर्म को दूसरों की धारणाओं एवं धर्म से श्रेष्ठ मानने लग जाते हैं | इस व्यवहार पर विशद व्याख्या करते हुए ही यह पुस्तक लिखने का विचार आया है |

हम पूर्णतया धार्मिक इंसान हैं एवं हर मजहब का पूरा सम्मान करते तहेदिल से करते हैं | हर धर्म में स्वार्थ व कुप्रचार की वजह से कई विचार तर्कसंगत नहीं रहते हैं और कई गलत धारणाएं बन जाती हैं जिन्हे बदलना जरुरी होता है क्योंकि इनमे से कई खतरनाक व विनाशकारी हो सकती हैं | आज तक विश्व में धर्म के नाम पर बहुत नरसंहार हुआ है व आंकड़े दिल दहलाने वाले हैं | यह तथ्य बहुत लोगों को मालूम नहीं है |

पुराने ज़माने का मानव इतना पढ़ा-लिखा व जागरूक नहीं था लेकिन आज कई लोग धार्मिक अंधविश्वासों एवं पुराने गलत रीति-रिवाजों को आसानी से नहीं अपनाते हैं, फिर भी कुछ लोग ऐसे हैं जो लकीर के फ़कीर बने रहकर गलत ढंग से जीवन व्यतीत करते हैं व धर्म का अर्थ ही नहीं समझ पाते हैं |

धर्म का सही अर्थ समझना आसान नहीं है | धर्म के असली तत्त्व /मर्म को जानने वाला इंसान कभी भी हिंसा या गलत काम नहीं करेगा | हर मूल धर्म में बहुत पाक सलाहें हैं लेकिन कुछ तथ्यों की प्रचारकों ने खतरनाक रूप से व्याख्या कर राखी है एवं यहीं से सारी गड़बड़ शुरू होती है |

साधारण मानव का मन गलत काम करने को आतुर रहता है क्योंकि सही मार्ग कठिन होता है | इसी वजह से घोर अपराध जैसे पशु बलि देना, उत्पीड़न करना, हत्याएं करना इत्यादि अपराधों को पथ भ्रष्ट लोगों द्वारा धार्मिक कार्य मान लिया जाता है | यह पागलपन है जो आज विश्व समाज को विनाश की कगार की ओर ले जा रहा है | हम सबको इसे रोकना होगा एवं धर्म की अच्छाई को ही अपनाकर अपना व विश्व का कल्याण करना होगा | विश्व कल्याण का भाव ही हर धर्म का मूल है परन्तु इसे हम नकारते रहते हैं | धर्म सिर्फ इंसान पर ही नहीं अपितु हर जीव-जंतु पर शासन करता रहता है | हम साधारणतया धर्म का अर्थ मंदिरों, गिरजाघरों, मस्जिदों, व अन्य धर्म-स्थलों में की जाने वाली पूजा-पाठ इत्यादि को मान लेते हैं जो वास्तव में उपासना की मानवकृत भिन्न-भिन्न पद्दतियाँ है व एक परमेश्वर के पास पहुँचने के अलग-अलग रास्ते हैं | धर्म मनुष्य को उसकी अंतरात्मा (अन्तःकरण) में स्थित दिव्य स्वरुप का रास्ता दिखाता है | कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो कभी न कभी बहुत ही सूक्षम्ता पूर्वक अपने कर्मों व व्यव्हार का आंतरिक मूल्यांकन नहीं करता हो | सच्चे चरित्रवान मानव किसी अलौकिक (Super Power) शक्ति के सहारे ही अच्छे कार्य करते हैं | यह महाशक्ति मानवीय जीवन का महामार्ग (मुख्य पथ) है जिसके दोनों तरफ भटकने वाले कुमार्ग भी बिछे हुए हैं | यह आकर्षित दिखने वाली गलियों भटकाव के रास्ते हैं जो भोले-भाले एवं कई बार बहुत ही बुद्धिमान मानव को भी धर्म के राजपथ से भटकाकार जीते जी ही नर्क में धकेल देते हैं | इस दुर्गति से बचने के लिए मानव को धर्म से ज्यादा आध्यात्मिकता की आवश्यकता है | बचपन व जवानी में इन भटकाऊ गलियों में बहुत से लोग चले जाते हैं, लेकिन अधेड़ अवस्था आते-आते काफी लोग मुख्यपथ पर आने की कोशिश करके उसमे सफल हो जाते हैं |

एक और भयंकर दुविधा यह है कि हर धर्म के कुप्रचारकों ने धर्म के सही रास्ते को गलत गलियों में मोड़ने के लिए ऊँची-ऊँची, सुसज्जित परन्तु खोखली दुकानें खोल रखी हैं एवं इनमे अधिकतर स्वनिर्मित कलयुगी गुरु व प्रचारक पोपलीलाएँ करते रहते हैं | वे झूठे प्रमाण देकर व अन्धविश्वास का सहारा लेते हुए क़यामत, स्वर्ग, नर्क, किस्मत, भूत-प्रेत, गलत ज्योतिष पर आधारित भविष्यवाणियां इत्यादि विनाशकारी कार्य करके लोगों को भटकाते रहते हैं | अतः इस गलत रास्ते में हमें भटकना नहीं है | सिख धर्म गत 550 वर्षों से एवं आर्य समाज गत 145 वर्षों से धर्म में आयी/प्रचलित कुछ बुराइयों को सुधारने की कोशिश करता रहा है लेकिन कुछ और सुधारों की आवश्यकता बहुत जरुरी हो गयी है |

आप अपने-अपने धर्म में ही रहते हुये प्रेम, शांति, सहचर्य, अक्रोध, को धारण करते हुए, प्रेमपूर्वक विचार करके एक दूसरे को हृदय से प्यार करना सीखें, यही आपका सही धर्म है | इसी एक विचार से ही आज प्रचलित विनाशकारी कुरीतियों जैसे एक-दूसरे से वैमनस्यता रखना, मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों व स्कूलों इत्यादि में निर्दोष लोगों की हत्या करना व कष्ट देना इत्यादि को रोका जा सकता है |

सब झगडे, दुःख, हर तरह के मन-मुटाव, भेदभाव, अन्याय व संघर्षों की उत्पत्ति इसी विचारधारा से होती है की सामने वाला मेरे विचारों से, मेरे विश्वास एवं धारणाओं से सहमत क्यों नहीं हो रहा है ? | किसी भी धर्म, पथ व विचार की कोई बात अगर आपको ठीक नहीं लगती है तो आप उसे अपनाओं मत परन्तु उसकी आलोचना से परहेज करें | धार्मिक पूजा के सभी रूपों को स्वीकार करने की परम्परा भारत के धार्मिक जीवन की हमेशा बड़ी विशेषता रही है | फ्रांसीसी दार्शनिक वाल्तेयर के महान कथन – “हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकारों की रक्षा करूँगा” को हमें अपनाना आवश्यक है | यह कथन दैनिक समाचार पत्र “राजस्थान पत्रिका” में हर रोज छपता आया है |

जिस धर्म में हम पैदा हुए, पले, उसे समझा व पाला, उसके कई धर्म पालक आज गलत कुरीतियों में फंसे हुए हैं एवं कई तरह के ढोंग, पाखंड व गैर जिम्मेदारी हरकतें करते हैं व अफवाहें फैलाते, उनकी वजह से हम हैरान व दुखी हैं | आज जब मानव ने इतनी तरक्की कर ली है कि वह अन्य ग्रहों की जमीन पर पैर रख रहा है फिर भी हम कई बार पाषाण युग एवं आदिमानव जैसी हरकतें करते हैं | धर्म को सही मायने में नहीं समझने की वजह से मानव ने मानव का जितना नुकसान किया है शायद ही कोई अन्य कारण से हुआ होगा | इसका कारण यह है कि अधिकांश इंसान (चाहे वे किसी भी धर्म के हों) धर्म का सही अर्थ नहीं जानते हैं |

हम जो लिख रहे हैं वह कई महान धर्मात्माओं, धर्म गुरुओं एवं अन्य सफल इंसानो द्वारा लिखा जा चुका है | हमारी कई बातें, धारणाएं, सुझाव व सोच कई लोगों के गले नहीं उतरेगी | वे हमें गैर जिम्मेदार समझेंगे, हमारी बुराई करेंगे व हो सकता है की हमें सतायें भी, परन्तु हमें उसकी कोई खास परवाह नहीं है क्योंकि हमारा असली धर्म व कर्म तो यही है कि हम गलत कार्य एवं पोपलीलाओं को रोकें | यदि एक व्यक्ति ने भी इस बात को समझ लिया तो हमारा लक्ष्य पूरा हो जाएगा क्योंकि उस एक की भी कोई न कोई एक तो सुनेगा ही | अगर कोई नहीं सुनेगा तो भी कोई बात नहीं, हमारी आत्मा को तो यह सांत्वना जरूर मिलेगी कि हमने हमारा धर्म निभाया है और धर्म को समझने की कोशिश की है व जिया है | इस कामयाबी के अलावा ज्यादा कुछ चाहिए भी नहीं | वैसे हमारा पूरा भरोसा है की यह प्रयास बेकार नहीं जाएगा क्योंकि हमारा ईमान, धर्म, अन्तःकरण पाक है व भगवान हमारे साथ है |

हमारी तो सबसे खास अरदास यही है कि आप अपने धर्म को सही से समझें एवं उसी में जीते हुए अपना व औरों का कल्याण करें | इस भावना के अलावा ना कोई धर्म, कर्म व शिक्षा है | हर मानव के प्रति करुणामय भावनाएं रखना, उसकी भावनाओं व आस्थाओं का अपने धर्म के बराबर दर्ज़ा देना एवं उनके अच्छे कर्मों में विश्वास रखना ही सही धर्म व कर्त्तव्य है | घृणा, हिंसा, ईर्ष्या व घमंड ही सबसे बड़ा अधर्म व पाप है |

आज पूरे विश्व में दुविधा यह है की हर धर्म में कुछ गलत प्रथाएं आ गयी हैं एवं कई अच्छे पढ़े लिखे लोग भी धर्म के कुप्रचारकों में शामिल हो गए हैं | इन कमियों को उजागर करने व उनसे निपटने की कुछ कोशिशें हमने की है | धर्मों के गूढ़ विषयों पर हम जैसे साधारण व्यक्तियों द्वारा लिखना कठिन काम है | हमारी थोड़ी बहुत अध्यात्म में रूचि है अतः हमने इस जटिल विषय पर लिखने का प्रयास किया है | हमारा किसी भी सज्जन का मन दुखाने का व नीचा दिखाने का कतई इरादा नहीं हैं | अतः इसमें वर्णित कोई बात अगर आपको अच्छी नहीं लगे तो बुरा मत मानना व हमें माफ़ कर देना |

हम यह धारणा रखते हैं कि हर धर्म में यह काबिलियत जरूर है की वह मानव को अच्छे रास्ते पर ले जा सकता है, अतः हम प्रत्येक धर्म का आदर करते हैं | यह भी परम सत्य है कि हर मनुष्य की धर्म से संबंद्धित धारणाएं कुछ अलग होती हैं, व बदलती भी रहती हैं | यह अच्छी बात है | हमने हमारे अनुभवों के आधार पर टूटे-फूटे शब्दों में धर्म व कर्म के बारे में लिखने का प्रयास किया है ताकि कुछ मार्गदर्शन करने वाली बातें आप तक पहुंचे | लेखन में कमियां जरूर है लेकिन हमें पूरा विश्वास है आप उन्हें नजरअंदाज करेंगे क्योंकि हम साधारण इंसान ही तो हैं | हम हर धर्म के पैगम्बरों, महान मानवों व आत्माओं को नमन करते हैं जिन्होंने समय-समय पर नये धर्म चलाये व भटके हुए इंसानों को सही रास्ता दिखाकर सांत्वना दी व उनका जीवन आनंदमय बनाया | जीवन को आनंदमय बनाना ही तो हम सबका प्रथम कर्त्तव्य एवं हर धर्म का सार तत्त्व है |

इस पुस्तक के लेखन के दौरान माह मार्च, 2020 में कोरोना-19 नामक विश्वव्यापी महामारी भारत में भी आ गयी एवं इसने हमें नए तरीके से सोचने को मजबूर कर दिया | हमारी यह प्रार्थना है कि जो लोग इस महामारी में बहुत जबरदस्त काम करते हुए महान योद्धाओं की भूमिका निभा रहे हैं, जैसे डॉक्टर, अस्पताल से जुड़े हुए सब कर्मचारी, पुलिसकर्मी, अन्य कई संस्थाएं व स्वयंसेवक इत्यादि योद्धाओं को भगवान हमेशा खुश व सलामत रखें | हम इन महामानवों को तहेदिल से नमन करते हैं |

आज के समय की इस असामान्य, भीषण महामारी एवं उत्पन्न आर्थिक संकट में एक दूसरे पर विश्वास व वैश्विक सहयोग की अत्यंत आवश्यकता है | अगर थोड़ी भी असहिष्णुता व राष्ट्रवादी अलगाववाद का भाव हुआ तो कोई भी छोटा सा देश व किसी भी देश का एक मानव पता नहीं कोनसे बटन का इस्तेमाल करके ना सिर्फ चुपचाप हमारी पूरी एकांतता (Privacy) की जानकारी हांसिल कर ले एवं हमें भयंकर संकट में डाल दे, लाचार बना दे एवं हमेशा के लिए ख़त्म कर दे | पूरे विश्व मानव व प्रकृति के सुन्दर भविष्य व अस्तित्व के लिए हमें वैश्विक एकजुटता (Global Solidarity) व आध्यात्मिक मय आचार शास्त्र (Ethics combined with spirituality) का पाठ युद्ध स्तर पर पढ़ना-पढ़ाना होगा |

मेरे बहुत से साथियों ने सटीक परामर्श व सहायता करते हुए कई तथ्यों का विस्तार से वर्णन करने में मदद की है | इसमें सर्वश्री डॉ. बजरंग लाल शर्मा, डॉ. लक्ष्मान सिंह राठौर, मेजर जनरल जसबीर कोर, वी.एस.एम (से.नि.), डॉ.संतोष कुमार नवीन, डॉ. रमेश शर्मा, डॉ. ओ.पी. गुप्ता, मनीराम सारण एवं श्री राजेश विनायक प्रमुख हैं |

इस लेखन में मेरे अनुज श्री रामनिवास मेहता, आर.ए.एस ने जो मदद की वह शब्दों में वर्णन नहीं की जा सकती | मैं उनके इस सहयोग के लिए ऋणी रहूँगा |

श्री युवाल नोआ हरारी, विश्व इतिहास के विशषज्ञ एवं अंतर्राष्ट्रीय बेस्टसेलर “सेपियन्स, मानव-जाति का संक्षिप्त इतिहास” के लेखक ने अपनी पुस्तक के प्रथम पृष्ठ पर जो निम्न पंक्तियाँ लिखी हैं वह हमारी प्रेरणा का एक मुख्य स्रोत हैं :-

“हमारे विश्वास (आस्था) चाहे जो भी हों, लेकिन मैं हम सभी को हमारी दुनिया के बुनियादी आख्यानों (वृतांत) पर सवाल उठाने के लिए, अतीत की घटनाओं को वर्तमान के सरोकारों (चिंताजनक बातें) से जोड़कर देखने के लिए और विवादास्पद मुद्दों से न डरने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ |”

श्री युवाल हरारी की उक्त पंक्तियों को इस पुस्तक में उद्धरित करने के लिए उनके द्वारा दी गई अनुमति व उनके द्वारा हमारे लिए भेजी गयी शुभकामनाएं पाकर हम धन्य हो गये हैं |

हमारे सहायक श्री भागचंद बलोदा, ग्राम-मुरलीपुरा, तहसील-शाहपुरा, जिला-जयपुर, एवं श्री श्रीनिवास स्वामी, निवासी-सेपटों की ढाणी, रणजीतपुरा, तहसील -किशनगढ़-रेनवाल, जिला-जयपुर की सराहनीय भूमिका रही है, वे धन्यवाद् के पात्र हैं |

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