क्या कहूं? स्वाभाविक, चुम्बकीय है यह आकर्षण,
इसके सम्मुख कुछ नहीं हमारे ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण ।
सुखी रहो, संतुष्ट रहो, बस एक ही प्यारा- प्यारी से,
संभालना एक दुसरे को, पार लगा लेना दुःखभरी दुनियादारी से ।
सीख सर्वोपरि है ,जीवन पार लगाने को,
परनारी / पुरुष का ख़्याल ही मिटा देगा आपकी हर ऊंचाई को ।
डूब जाएगा जीवन, अपमानित होगी समस्त पीढ़ियाॅं
गहरी खाई में जा गिरोगे, जहां न होगी सीढ़ियाॅं ।
लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत
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