पवित्र है यह बंधन पर मांगता बेहद त्याग दोनों से,

नियोजन हो सोच समझकर, जुड़ना सिर्फ बराबर वालों से,

हो अगर वैचारिक समानता तो दरकिरनार करना जाती व धर्म,

ध्यान रहे स्त्री पुरुष पूर्ण होते हैं आत्मिक मिलन से,

नहीं निभेगा यह रिश्ता सिर्फ शारीरिक संबंधों से,

मत चुनना साथी विषय वासना के वेग में,

कतई ठीक नहीं है “लिव इन रिलेशनशिप” का रिश्ता,

बढ़ना आगे सोच समझकर बेहद धीरज से

महारथी भी धोखा खा जातें हैं करके जल्दबाज़ी

निर्णय मत कर लेना अकेले ही

सलाह-मशविरा जरूर लेना बुजुर्गों से,

देखी है उन्होंने दुनिया, कइयों ने खाई है चोटें,

परिपक्व हुए हैं गुजर कर इस दौर से।

परिजन करेंगे छानबीन, मामला नहीं कुछ वर्षों का,

सनातन धर्म तो मानता इसे रिश्ता सात जन्मों का,

मैं इस पर चुप हूँ, हाँ कहूंगा एक बात,

सही चुनाव से ले पाओगे आनंद इस जन्म का।

हर कार्य उचित होगा यदि हो वह समय से,

आत्मनिर्भरता व अर्थ का साधन होना भी है जरुरी,

शादी ना हो परिपक्वता से पहले व बहुत देर से।

गलत चयन, स्वार्थपरता व असहनशीलता से खेल बिगड़ेगा,

वफ़ादारी की कमी गुस्सा, व शक कराते विवाह विच्छेद,

क्षमा भाव, समतामय आचरण ही बिगड़ा काम सुधारेगा।

नर को भी अपनाना होगा भाव समर्पण का,

अडिग रहना वादों पर, टोटा ना हो विश्वास का,

मत बनाओ अबला को त्याग में देवी,

उसका हक़ व दर्जा है बराबरी का।

महर्षि अरविन्द ने वर्तमान को कहा था मदर सेंचुरी,

अबला है अब सक्षम, बन जाने दो उसे केंद्रीय धुरी।

नर-नारी है आधे-आधे, पूर्ण होंगे पाणिग्रह से,

बाँट कर सुख-दुःख करते हैं अपनी नैया पार,

गृहस्थी बन जाती है कारावास तालमेल की कमी से।

मत उत्पन्न होने देना स्थिति विवाह विच्छेद की,

जरुरी नहीं मसला हल हो तलाक से,

कोशिश करना इस भयावह स्थिति को टालने की।

अगर हो जाए विच्छेद तो जरूर सुधारना,

सीख लेना खुश रहना, मत करना बुरी बातों को याद,

यही एक तरकीब है जिसे नहीं पड़ेगा पछताना।

वरना रहेगा मलाल अंतिम सांस तक।

ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)