मानव के सब सुख-दुःख ,उतार- चढ़ाव निहित है विचारों मे,
इन विचारों से ताकतवर कोई चीज नहीं है इस विश्व में
संसार की समस्त फौजे कुछ मायना नहीं रखती इनके समक्ष
हर क्षण उत्पन्न होते हैं कई विचार हमारे महान मस्तिष्क में
और मचा रहता है घमासान अच्छे और कुविचारों के बीच में
वज्ञैानिक नहीं समझ पाए हैं विचारों की उत्पत्ति की प्रतिक्रिया
कठिनाई जरूर आती है विचारों को रोकने और सुधारने में ।
हां, हम में क्षमता जरूर है व रोक सकते हैं गलत विचारों को क्रियान्वित होने से,
जीव का हर कार्य होता है उसके मस्तिष्क में उत्पन्न हुए विचारों से
रहता है सन्मार्ग पर सत्कर्म करते हुए, विचारों के सही दिशा निर्देशन से
शिक्षा देना मस्तिष्क को ताकि ना हो क्रियान्वित गलत विचार
ताकि कोई कुकर्म ना हो जाये कुत्सित विचारों के आवेश से
हर तरह का विनाश होता आया है मानव के गलत विचारों से
मदद लेते रहना सद्ग्रंथों और महान आत्माओं के विचारों से
जब होता है आप और अन्यों के विचारों में मतभेद
झगड़ा- फसाद हो सकता है, इनके तालमेल नहीं बैठने से
ऐसे अवसरों पर शांति कायम रख पाओगे चुप्पी साध लेने से
विचारों के सुधार से ही अर्जुन ने जीता था कुरुक्षेत्र का महायुद्ध
सविुचारों से ही डाकू रत्नाकर वाल्मीकि ऋषि बनकर हो गया था बुद्ध
धर्म, संस्कृति और शभु परंपराएं जीवित रहती हैं सदविचारों से
रखना विचारों और व्यवहार में पवित्रता और प्रेम का समावेश
जरूर मिलेगी आत्मसंतुष्टि, प्रसन्नता और समृद्धि पवित्र विचारों से
सही विचारों से ही सुधरता व निखरता है हमारा व्यक्तित्व
सुधार लेना विचारों को ध्यान, गुरु व महापरुुषों के सान्निध्य से
कर लेना अतःकरण के भावों की शुद्धि मन के तप से (1)
मत आड़े आने देना कुविचारों को सत्कर्मों के आगे,
सकारात्मक विचारों से ही जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर पाओगे।
रहना सदैव वर्तमान में, सहजें हुए सात्विक वैचारिक पूँजी को,
इस धन के तुल्य कोई कोई शक्ति नहीं है इस ब्रह्मांड में
इसी के सहारे पहुंचोगे शिखर पर, कोई नहीं रोक पाएगा आपको ।
संदर्भ
- मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ।।
श्रीमद्भगवद्गगीता, 17-16
भावार्थ – मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के विचारों की भलीभाॅंति पवित्रता – इस प्रकार यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है ।
लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत
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