इस अध्भुत व महाशक्ति का सदुपयोग ही करना

सबसे महत्वपूर्ण व अनुपम ईश्वरीय देन है यह हमें,

इसी से बने हैं हम अद्वितीय अन्य जीवों की तुलना में।

कई शास्त्रों ने शब्द को ही माना है ब्रह्म,

ध्यान रहे शब्दों में क्षमता होती है अहम्।

बाइबिल बताती सृष्टि की उत्पत्ति सिर्फ शब्द से,

सनातन धर्म में भी ओम् (ॐ) शब्द की भूमिका है सर्वोपरि

हर आराधना शुरू होती इसी के उच्चारण से।

ओम् का ही रूप माना गया है वाक्शक्ति – माँ सरस्वती,

इसी शक्ति से बनते विचार हमारे मष्तिष्क में जिन्हे शब्दों का रूप देता हर व्यक्ति।

याद रखें, महाशक्तियों का दुरूपयोग होता है बेहद घातक,

शब्दों के गलत चुनाव से हुए हैं कई महाभारत आज तक।

वाणी के दुरूपयोग से बन जाते हैं अपने भी पराये,

इसी के सदुपयोग से बनते हैं घनिष्ट मित्र कई पराये,

इसी के सदुपयोग से बनते हैं घनिष्ट मित्र कई पराये।

तारीफ व खुशामद के शब्दों का पूरा आंकलन करना,

चापलूसी से बचना, सही प्रशंसा में कमी मत रखना।

ना हो वाणी का उपयोग, छल, कपट, व असत्य के लिए भूलकर भी,

आलोचना व कमतरी का भाव ना हो भाषा में कभी भी

गलत शब्दों का प्रयोग करते सिर्फ क्रोधी, ईर्षालु व दम्भी

ये होते हैं असंतुष्ट, दुखी व कर्कश स्वभाव वाले, नहीं होंगे यह सुखी, संपन्न व सफल कभी।

ध्यान देना बच्चों पर, वे सीखते हर शब्द अभिभावकों से,

विनम्रतामय मधुर शब्दों से ही बतलाना उनसे

कहीं भर ना दें आपकी कर्कश वाणी

उन्हें विकृत मानसिकता से

बच्चों की भाषा का सीधा सम्बन्ध है उनकी परवरिश से।

मत छोड़ना बोलने की मर्यादा, चाहे कितना भी अपमान हो आपका,

अपशब्द व गालियां देना होता है काम कायरों का।

गर्माते माहौल में बोलने से होता अक्सर नुकसान,

ऐसे वक्त में तो मौन साधना से ही बचेगा आपका मान।

शांत मन से ही उपजेगी सुकून व इत्मीनान देने वाली भाषा,

चुनना शब्दों को सद्भावना व समधुर युक्त सज्जनता से

मन में हो खलबली तो नहीं रख सकते अच्छे शब्दों की आशा।

क्या, कब, कैसे और कितना बोले, जरूर सोचना ?

ज्यादा बोलने पर मानव गिर जाता है सबकी नज़रों में

हर शब्द है बेहद कीमती रत्न, तोल-मोल के ही प्रस्तुत करना।

कितना ही बड़ा पद, ओहदा व मान-सम्मान हो आपका,

गुरुर मत करना व मिठास मत गायब होने देना वाणी का।

बोलना पड़ सकता है दुशमनों व गलत इंसानों के सामने,

कठोर शब्दों का उपयोग मत करना

चाहे वे कहना मानें या ना मानें।

बोलने की बजाय आदत रखना ज्यादा सुनने की,

इससे हासिल कर पाओगे कई जानकारियाँ

व पहचान सकोगे मनोदशा बोलने वाले की।

अनावश्यक वार्तालापों में वक्त ख़राब मत करना खुद व अन्यों का,

बर्बाद होगा समस्त जीवन अगर ध्यान नहीं रखा इस खामी का।

मन, विचार व वाणी का है घनिष्ट सम्बन्ध,

अंतर्मन में कुछ पर आप बोले और कुछ

इसी से होते है सारे द्वन्द।

वो ही बोलना जो सच्चे मन की सोच है,

वर्ना चुप रहना, उसी में आपकी जीत है।

वाक् संयम है सच्चा ज्ञान, यह किसी भी साधना से काम नहीं,

ध्यान रहे बोले शब्द, अनबोले होते कभी नहीं

हथियारों के घाव भर जाते हैं समय के साथ

कटु वाणी के घाव भरते कभी नहीं।

सन्दर्भ

  1. Bible – John 1:1 – Before the World began, the word was there. The word was
    with God and the word was God

आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था (यूहना 1:1)

  1. भारतीय विद्वान शब्द को ब्रह्म अर्थात ईश्वर का रूप मानते हैं। शब्दाद्वैतवाद के अनुसार, शब्द ही ब्रह्म है। शब्द ही सत्ता है। संपूर्ण जगत शब्दमय है। आरम्भ शब्द ‘ओउम्’ (ॐ) माना गया है।

ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)