थोड़ा बहुत खुदगर्ज़ी का स्वभाव होता है हर मानव में,
सात्विक स्वार्थ वाला नहीं करता है किसी का नुकसान
बनाए रखना होता है परमार्थ और स्वार्थ का संतुलन जीवन में
वर्तमान में कुछ ज्यादा ही भरमार है स्वार्थी लोगों की चारों तरफ
कई बहुत करीबी और अपने भी शामिल हो गए हैं इनमे
आंकलन जरूर करना, क्यों हैं हमारे अपने इतने खुदगर्ज़ ?
हो सकता है हो कोई मजबूरी या दुःख – दर्द उनके जीवन में
मंथन अवश्य करना खुद के आचरण व विचारों का
सुधारना खुद की सोच, अगर है कोई गलतफहमी हमारे मन में
कर लेना सीमाएं तय, अगर अपने भी हो गए हैं बेवजह मतलबी
मत गंवाना अपना समय व ऊर्जा इनको सुधारने में
नहीं होता है आसान बदलना माहिर स्वार्थियों को
मानसिक शांति चाहिए तो देरी मत करना इनसे दूरी बनाने में ।
चापलूसी करने वालों से भी अवश्य सावधान रहना,
ऐसे लोग तो आपसे जुड़ते हैं सिर्फ अपने मतलब के लिए
मकसद पूरा होते ही वे करेंगे आपको पहचानने से भी मना
मतलबी यार अक्सर धोखा देते हैं आपके कठिन समय में
सुख शांति चाहिए तो रिश्ता सिर्फ़ निःस्वार्थी दोस्तों से ही रखना ।
लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत
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