संतान दो जरूर हो – दो से अधिक ठीक नहीं

यह शीर्षक कई महाशयों को नापसंद होगा,

बहुत तथ्यों को खगोल कर रची है यह कहानी

दिल की बात कहने से मेरा मन जरूर शांत होगा।

भावी पीढ़ी के लिए यह विचार है उपजा,

बिन मांगे राय है यह फिर भी थोड़ा गौर करना

उसके उपरांत अगर देना चाहो तो दे देना मुझे सजा।

व्यक्तित्व का विकास होगा हम उम्र के भाई बहनों से,

ऐसे बच्चे ही सीखते हैं गुर सुख-दुःख झेलने के,

सहते व बांटते हैं जीवन की विप्पतियाँ आसानी से।

काम मौके मिलते हैं इकलौते बच्चों को,

सहयोग, त्याग व परमार्थ के गुण अपनाने के,

अक्सर हो जाते हैं यह हठी, अहंकारी व स्वार्थी

माँ-बाप का अत्यधिक प्यार भी बिगाड़ता है इनको।

आर्थिक बोझ की दलील देते हैं कई लोग

जो करते हैं एक ही बच्चे की तरफदारी,

दो का लालन-पालन पड़ सकता है कइयों को भारी,

यह जोखिम उठाना होगा बच्चों के हित में,

संताने रहेगी जनको(माता-पिता) के ताउम्र आभारी,

इकलौती संतान खुद अपने जीवन को ही नहीं,

माँ-बाप का बुढ़ापा भी बना लेती है चुनौतीपूर्ण,

गुजर रहे हैं कई बुजुर्ग इस दौर से होकर मजबूर

उनकी अधिकतर इच्छाएं रह जाती है अपूर्ण।

दो से ज्यादा संतानों की बात नहीं है अतिश्योक्ति,

जनसंख्या के भार से धीमी हो सकती है हर प्रगति,

वोटों के कारण सरकारें नहीं बनाएगी सख्त कानून,

जनजागरण व जनमानस अब है बहुत जरुरी,

नेताओं में कम ही है प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति।

एक मत होना होगा सब धर्म व संप्रदाय के लोगों को,

असंतोष फैलेगा अगर नहीं जुड़े सब तबके के लोग,

कष्ट तो वह भी भोगेंगे जो नहीं स्वीकारते,

वर्तमान में बढ़ती जनसँख्या की गंभीरता को।

ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)

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1 Comment

  1. Chandra Shekhar Mehta

    thank you for hitting the nail in a poetry way . For harmonious development of siblings and parental support in old age atleast two childern should be there in the family. Today gen need to sacrifice for the their kids

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