ख़ास धर्मों को समझा व जिया है करीब से,

हर धर्म का मर्म है बेहद पावन

सबका आदर करता रहूँगा तहे दिल से।

धर्म है सिर्फ सच्चा मन, आत्मा व आत्मज्ञान,

जिसमें रहता हरदम हम सबका एक ही ईश महान

जो पहचाने व सुने उसको, वही है धार्मिक इंसान।

धर्म नहीं सिर्फ पूजा-पाठ व ईश के आलयों में जाना,

चढ़ावा, दान जरूर देना सही धर्म की कमाई का

असली धर्म तो मानवता के लिए कुछ कर गुजरना

धर्म नहीं सिखाता गला काटना व पड़ौसी का माल हड़पना।

झूठ, कपट व धोखा देने से बड़ा नहीं कोई अधर्म,

अच्छाई, भलाई, व सच्चाई के अलावा कुछ भी नहीं धर्म।

जो कर्म दे शान्ति व करे सर्वांगीण विकास हर जीव का,

जरूर अपनाओ ऐसे धर्म-कर्म, पर दिल ना दुखाना किसी का।

धर्म क्षेत्र से होता है कर्म क्षेत्र आसान,

प्रेय से दूर, श्रेय करवाता है धर्म का ज्ञान।

धर्म ही उभारेगा भ्रमित मन को, मोह-माया जाल से,

मधुर सुदृढ़ सबंध बनते व निभते हैं धर्म-मय न्याय से।

जो चिंतन बचाता कुकर्मों से वह है सबल जड़ धर्म की,

विनाशकारी सोच ही है ख़ास मूल सब अधर्मों की।

पूजा पाठ हो दिल/घर के कोने में, मिलेगी असली शान्ति,

सच्ची इबादत और ध्यान के हैं बेशुमार फायदे

अर्ज है अब तुरंत हो इस बदलाव की क्रांति।

दिखावा से बड़ा कोई अधर्म नहीं,

अज्ञानी कहे उनका ही धर्म सर्वोपरि,

इससे बढ़कर कोई भूल नहीं

भटका रहे हैं कई अपरिपक्व पंडित, पादरी व मौलवी

धरा पर इनसे नासमझ व खतरनाक कोई जीव नहीं।

दूर रहना इनसे, यह बनाते हैं भोले-भालों को खलनायक,

कभी ना बनना इनके अनुयायी, ये नहीं शक्ल देखने लायक।

नासमझों ने बना रखा है धर्मों को सिर्फ अपने फायदे का औजार

जबकि बनाना था धर्म को मदद व भाईचारे के लिए

अफ़सोस ! धर्म को बना रखा है कइयों ने तेज धार वाला हथियार

झगड़े – फसाद करने कराने को वे रहते हैं हरदम तैयार।

तरकीबें सोचते हैं मानवों को आपस में बांटने के लिए,कई

कुछ न कुछ गलत हो रहा है कई धर्मों के नाम पर,

कुछ अफसर व राजनेता भी कर रहे हैं अक्षम्य अपराध,

सबसे गंभीर चोट है यह पूरे विश्व समाज पर।

अनुरोध है, उखाड़ फेंको इन दुष्टों को जड़ मूल से,

ऐसी सजा दो कि वे कभी आँख ना मिला सके किसी से।

हक़ नहीं है अपरिपक्व व अधर्मियों को कुर्सी पर बैठने का,

क्या भला करेंगे ऐसे मानव हमारा और विश्व का ?

जो हृदय है करुणा व प्रेम-विहीन,

उसमें धर्म / प्रभु का आवास नहीं रहा आज तक,

सच्चे धर्म प्रचारक सिखाते हैं सिर्फ मनुष्यता

मानवता ही धर्म मानो, भलाई करो अंतिम साँसों तक।

जो जिस धर्म को माने पूरी आजादी देना उसको,

याद रहे नहीं पहना सकोगे एक ही नाप का चोला हरेक को

जग में अर्चना के रास्ते सदैव रहे हैं अनेक

पर पहुँचती है हर अरदास सिर्फ उसी एक को।

विरोध करना गलत धार्मिक सोच व बेतुके रीती-रिवाजों का,

प्रोत्साहित मत करना जो समर्थन करते हैं धर्म परिवर्तन का।

दूर रहना उन राजनेताओं से जो करते हैं वोटों की राजनीति,

मत चलने देना उनकी चालाकियाँ और बिखराव की रणनीति।

कर्तव्यपरायणता, ईमानदारी, दया, भाईचारा ही है धर्म की जड़ें,

जो है इनसे दूर, उनसे भूलकर भी ना जुड़ें।

घृणा, हिंसा व अन्याय नहीं सिखाता कोई मजहब,

बहुत हो गया खून-खराबा तुरंत जागो अब।

सरल भाषा में सुनो धर्म है नैतिकता व सदाचरण,

अगर करनी है नैया पार तो ले लो इनका प्रण।

धर्म जन्मता व फलता है सिर्फ परोपकार के बीजों से,

विकृत होगा, गर सींचा इससे कट्टरता व असहिष्णुता के नीर से।

समय बदल रहा है, तकरार हो सकती है धर्म व विज्ञान में,

विज्ञान करेगा बेशुमार उन्नति, पड़ सकता है धर्म से भारी,

परास्त नहीं होगा धर्म, इसकी छाप सदैव रहेगी मानव मस्तिष्क में।

ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)