कभी ना भूलें हमारा प्रथम कर्त्तव्य
जो है प्रफुल्लित रहना,
आनंद है हमारी प्रकृति में व्याप्त
बस इसे संजोये रखना
इसे पाने के लिए कहीं नहीं जाना पड़ेगा दूर
हमारे मस्तिष्क में है इसका भरपूर खजाना।
हर मानव मूलतः सच्चिदानंद है,
हम आनंद से उपजे हैं व आनंद में जीते हैं
मृत्युपरांत भी हम आनंद में विलीन होते हैं।
जगत में दुःख है, आते हैं पर हमें नहीं है उन्हें ओढ़ना,
बहुत उपाय हैं, उन्हें याद रखना व आजमाना
प्रसन्नचित के लिए, सीखो अपना दृष्टिकोण बदलना
जिंदगी की भाग-दौड़ में ख़ुशी जरूर ढूँढना
उम्र के हर पड़ाव में, कुछ न कुछ नया जरूर सीखते रहना
सत्कर्म व फ़र्ज़ बिना श्रेय लिए करना
अपने आप को कभी भी औरों से अहम् मत मानना
अपने धन, ज्ञान व पद का दिखावा ना हो
सबकी भावनाओं का सम्मान जरूर करना
वाणी में हो मधुरता, किसी का भी उपहास मत करना
अपने से छोटे व बच्चों के भी दोस्त बनकर रहना
सबसे अहम् बात घृणा किसी से मत करना
यह बातें छोटी नहीं है इनका ध्यान रखना।
अच्छी शिक्षा लेना व देना है असली पूँजी ख़ुशी की
कोई भी कार्य शुरू करने से पहले पूरी जानकारी करना उसकी।
भूतकाल से सीख लेकर उसे वहीँ छोड़ देना,
दूरदर्शी व चौकस रहना है जरुरी
ख्याली पुलावों से दूर रहकर ठोस योजनाएं बनाना
कुछ भी हो सिर्फ वर्तमान में रहना
सबसे कीमती है समय का सदुपयोग जरूर करना
उसे अगर नष्ट कर दिया तो ताउम्र पड़ेगा रोना।
अच्छा स्वास्थ्य ही है सुख का असली आधार,
वर्जिश, ध्यान व योग है जरुरी
इन्ही से रहोगे सुखी, हो जायेगी आपकी नैया पार।
कठिन समय में ध्यान से ही रह पाओगे शांत
प्रकृति के बीच हर रोज कुछ समय जरूर बिताना
यह रखती है हमें प्रफुल्लित
व सिखाती है अनुशासन में रहना
औरों को जीतने के बजाये अपने आप को जीतना
अगर जीत लिया मन को तो कभी भी नहीं पड़ेगा पछताना
सही व आपसे मिलती-जुलती सोच वालों के साथ
मेल मिलाप व दोस्ती रखना
आज, आप जो भी है उसका आनंद लेना।
मत करना तुलना दूसरों से,
अगर आप खुश है तो कम नहीं किसी से।
आप क्या हो सकते थे उसका दुःख मत करना
स्वधर्म का पालन करते रहना।
धर्म का असली रूप याद रखना
जो है सेवा, उदारता, भाईचारा व विनम्रता,
सिर्फ इन्हीं गुणों से मिलेगी जीवन में
हर दिन ख़ुशी व सफलता।
हमारा लक्ष्य हो खुश रहना व ख़ुशी बांटना,
खुश मिजाजी ही कर पायेगा पूरी यह मनोकामना।
दुखी इंसान खुद ही नहीं है रोते,
वो तो बिगाड़े रखते हैं पूरा माहौल
और अलविदा भी होते हैं रोते-चिल्लाते।
सन्दर्भ
- आनन्दो ब्रह्मनेती व्यजानत।
आनन्देन जतानि जीवन्ति। आनंद प्रयन्त्यमिसविशन्तीति।
तैत्तिरीयोपनिषद, भृगुवल्ली अनुवाक – 6 – 1
भावार्थ – आनंद ही बृह्म है वास्तव में आनंद से ही समस्त प्राणी
उत्पन्न होते हैं। उत्पत्ति के बाद आनंद से ही जीवन जीते हैं और अंत में आनंद में ही प्रविष्ट होते हैं।
ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)
Babu lal Kumawat
बहुत अच्छा है
Babu lal Kumawat
Very nice sir ji