पर्यावरण प्रदूषण की विभीषिका व कुछ उपाय

(प्रकृति को सुरक्षित रखना होगा वरना हर तरह का विनाश होता रहेगा)

(लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता, एम.डी.(मेडिसिन), सेवानिवृत)

प्रकृति और मनुष्य एक दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति के साथ मनुष्य का अच्छा तालमेल व उस से मित्रतापूर्ण संबंध सिर्फ मानव ही नहीं अपितु पूरे विश्व के जीव – जगत के सुखमय जीवन और उज्जवल भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान में जो जलवायु परिवर्तन हो रहा है उससे न केवल मनुष्य के लिए ही बल्कि पूरे जीव-जंतु और वनस्पति जगत के लिए भी बहुत बड़ा संकट पैदा हो गया है। जलवायु परिवर्तन के कारण करोड़ों लोग अपना देश छोड़कर अन्य जगह विस्थापित होने को मजबूर हो रहे हैं। पर्यावरण में आए इस असंतुलन के लिए बहुत हद तक मानव जिम्मेदार है। हम हमारे जीवन को आरामदायक बनाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन कर रहे हैं जिसकी वजह से पर्यावरण को हानि हो रही है। अतः यह जरूरी है कि हम प्रकृति का अनावश्यक दोहन न करते हुए उससे मित्रतापूर्ण संबंध रखें ताकि इस चराचर के समस्त जीव -जंतु और वनस्पति इत्यादि सुरक्षित रह सके। पर्यावरण विकृति की वजह से ही ग्लोबल वार्मिंग, सुनामी, भकूंप, जल संकट, बीमारियों का प्रकोप और बिगड़ती हुई अर्थव्यवस्था इत्यादि का कहर समूचा विश्व भुगत रहा है।

पर्यावरण के यह सब घटक एक दूसरे से बहुत ही घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। अतः किसी एक में अगर थोड़ा सा भी विकार आता है तो अन्यों पर बुरा असर हो जाता है। इस समय पूरा विश्व मौसम के तीव्र बदलाव जैसे अत्यधिक गर्मी, कम समय में ज्यादा बारिश, बाढ़ इत्यादि के दौर से गुजर रहा है, इन सबसे न्यूनतम हानि हो इसके लिए हमें पहले से तैयारी करनी होगी ताकि सांप निकल जाने के बाद लाठी पीटते रहने जैसी स्थिति न बने। वर्तमान की इन भीषण चुनौतियों को देखते हुए समस्त देशों की सरकारे, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्य हितधारकों द्वारा पर्यावरण प्रदुषण के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए जो कार्य किये जा रहे हैं अब समय के साथ उनमें तेजी लाने की जरूरत है।

अगर हमें इस वसुंधरा और हमारी आनेवाली पीढ़ी को सुरक्षित रखना है तो हम सबको अपना योगदान भी तुरंत शुरू करना होगा वरना यह तय है कि यह संसार किसी के भी रहने लायक नहीं रह जायेगा। अथर्ववेद में भूमि माता के लिए जो कहा गया है उसे हमेशा याद रखें।

यत्ते भूमि विखनांमी क्षिप्रं तदपिं रोहतु ।
मां ते मर्म विमृगवरी या ते हृदंयमर्पिपम ।।

अथर्ववेद 12 /1/35

भावार्थ

हे भूमि माता ! मैं जो हानि तुम्हें पहुंचता हूँ शीघ्र ही उसकी क्षतिपूर्ति हो जावे। मैं कभी भी आपके मूल या मर्म (हृदय) को आहत न करूं।

उपाय

प्रकृति में होने वाली अनेक आपदाएं जैसे ज्वालामुखी, आकाशीय तड़ित, भूकंप, अति वर्षा इत्यादि को हम रोक नहीं सकते लेकिन उनसे होने वाले विनाश की अगर हम पहले से तैयारी रखें तो जान-माल का नुकसान अवश्य कम होगा। जिन आपदाओं के उत्पन्न होने में मानवीय गतिविधियों का सीधा संबंध है उनको तो हम काफी हद तक रोक सकतेहैं। उनके प्रकोप से होने वाले नुकसान को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है अतः हमको तुरंत निम्नलिखित बिदंओुं पर युद्ध स्तर पर काम करना होगा अन्यथा कई और नए-नए पर्यावरणीय दुष्प्रभाव चुनौतियों के रूप में हमारे सामने आते रहेंगे।

1. जल सकंट का समाधान

गत 50 वर्षों में हमने देखा है कि बारिश में कमी आई है एवं अगर होती भी है तो असमय पर, जिससे फसलों का नुक्सान ही होता है। वर्षा कब, कितनी और कहां होगी इसका ठीक से अनुमान लगाना मुश्किल होता जा रहा है । इस मामले के मर्म में न जाकर हमें जल की एक-एक बंदू का सदुपयोग करना सीखना होगा एवं जहां तक हो सके ऐसे हालात बनाए रखना होगा जिससे वर्षा में थोड़ी बहुत बढ़ोतरी होती रहे। जिस इलाके में पेड़-पौधे अधिक होंगे वहां वर्षा में बढ़ोतरी अवश्य होती है, यह वैज्ञानिक सत्य है। आज हमें हर हालत में पेड़ों को काटने से रोकना होगा एवं नए पेड़ भी लगाने होंगे ताकि यह वन संपदा हमारे पर्यावरण की संरक्षिका बनी रहे, हमारी प्राणवायु शुद्ध रहे, पक्षियों को सुकून मिले एवं प्राकृतिक सौंदर्य भी बना रहे।

जल का सदुपयोग करते हुए बेवजह पानी नहीं बहाना है। कई बस्तियों में घरों का पानी गलियों / सड़कों पर बहा दिया जाता है जो वहां पर जमा होकर गंदगी व बीमारियों को बढ़ावा देता है। इस वेस्ट वाटर का ट्रीटमेंट करके उसको सिंचाई इत्यादि के लिए काम में लेना जरूरी हो गया है।

पानी की कमी पूरे विश्व में गरीबी बढ़ा रही है। भारत में तो यह एक विकट समस्या है क्योंकि फसली क्षेत्रों का 60% से अधिक हिस्सा अभी भी बारिश पर निर्भर है। जिन क्षेत्रों में कृषि कुओं व तालाबों से होती थी उनकी हालत तो बहुत ही नाजुक हैं क्योंकि अधिकतर कुएं और तालाबों का पानी पूरी तरह से सूख गया है। वर्तमान में देश के भूमिगत जल के स्रोत औसतन 40% सूख गए हैं। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान में भूमिगत जल के पूरी तरह खत्म हो जाने का खतरा है। यह एक मुख्य कारण है जिसकी वजह से कृषि अपने बुरे दौर से गुजर रही है एवं ज्यादातर कृषक अन्य काम ढूंढने के लिए विस्थापित हो रहे हैं। गरीबी उन्मूलन के लिए अब हमें भूजल को रिचार्ज करना होगा। इस समस्या का समाधान काफी हद तक नदी जोड़ परियोजनाओं द्वारा किया जा सकता है। इस योजना के सफल होते ही भारत की सूखाग्रस्त भूमि का हर एक इंच और हर सूखा गला पानी से तर हो जाएगा। इस योजना से नदी जल बंटवारे के विवाद कम होंगे, बाढ़ कम आएगी एवं नदियों के प्रदुषण स्तर में भी कमी आएगी।

बढ़ते औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण ज्यादा आबादी वाले शहरों में गंभीर जल संकट पैदा हो रहा है। दिल्ली और बेंगलुरु जैसे महानगरों में जल संकट ने बहुत जबरदस्त दस्तक दे रखी है। अब हमें जल संकट से उपजे खतरों की अनदेखी न करके जल संरक्षण के प्रयासों को तुरंत मजबूत करना होगा।

2. ग्लोबल वार्मिंग का कहर

(सिर्फ ग्लोबल वार्मिंग की वजह से 2030 तक दुनिया भर में अतिरिक्त 13 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे पहुंच सकते हैं – विश्व बैंक)

आज पर्यावरण संतुलन के प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन हो रहा है और हम प्रकृति के रख-रखाव की लगातार अनदेखी कर रहे हैं। जंगलों की कटाई पर कोई रोक नहीं है एवं बिजली उत्पादन के लिए जीवाश्म इधनों जैसे कोयला एवं तेल का भी इस्तमाल अंधा-धुंध तरीके से चालू है। वातावरण में मौजदू ग्रीन हाउस गैसों जसै कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, एवं मानव निर्मित ग्रीन हाउस गैसो – क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (एचसीएफसी) के उत्सर्जन को कम करके ग्लोबल वार्मिंग का दुष्प्रभाव कम किया जा सकता है।

तापमान की बढ़ोतरी से दुनिया की हर गतिविधि पर असर पड़ता है, बीमारियां, दुर्घटनाएं और हिंसक अपराध बढ़ते हैं। द ब्रिटिश मेडिकल जनरल के शोध के अनुसार भारत में ग्लोबल वार्मिंग एवं वायुप्रदुषण से हर 5 मिनट में एक नवजात और 3 मिनट में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौत होती है। साइमन स्टील, संयुक्त राष्ट्र जलवायु पैनल के प्रमुख, ने 4 जून 2024 को बाॅन (जर्मनी) में आयोजित जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के दौरान अपने उद्घाटन भाषण में चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर मौजूदा हालातों में बदलाव नहीं हुआ तो हम लगभग 2.7 डिग्री तापमान बढ़ोतरी की ओर बढ़ रहे हैं और यह स्थिति आधी दुनिया के लिए बेहद विनाशकारी है। बढ़ते तापमान की वजह से समुद्र जलस्तर बढ़ता है, बाढ़ आती है एवं खाद्य पदार्थों की कमी का खतरा भी बढ़ जाता है। अतः कार्बन उत्सर्जन को हर हाल में कम करना होगा ताकि हमारी पृथ्वी पर जीवन के अनुकूल परिस्थितियां बनी रहे। वर्ष 2024 में गर्मी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और दिल्ली में अधिकतम तापमान 52.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया जो देश के इतिहास का सबसे ज्यादा तापमान है।

गर्मियों में जंगलों में आग हमेशा से लगती आई है और आगे भी लगती रहेगी। हमें वनों के अंदर जल छिद्र बनाकर छोटे-छोटे तालाब बनाने होंगे और जब भी वर्षा होगी इनमें पानी संगहृीत करना होगा। इस सेवनों की नमी बरकरार रहेगी और आग भी कम लगेगी और अगर लग भी गई तो ज्यादा नहीं फैलेगी। तापमान वृद्धि की वजह से हिमनदों का पिघलना जारी है और यह विशाल हिमनद झीलों के रूप में परिवर्तन हो रहे हैं, जिससे नदियों में बाढ़ आती है और जल संकट का सामना करना पड़ता है।

अंटार्कटिका के हिमखंड जो सर्यू के प्रकाश को अतंरिक्ष में परावर्तित कर पृथ्वी को ठंडा रखते हैं एवं हमें सूर्य के ताप से बचाते हैं वो भी अब जलवायु परिवर्तन के कारण बार-बार टूट रहे हैं। इन ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और तटीय बाढ़ एवं तूफ़ान के खतरे भी आए दिन बढ़ रहे हैं। कई छोटे-छोटे समुद्री दीप डूब रहे हैं और वहां के निवासियों को मुख्य भूमि बसाया जा रहा हैं। इन सबके मध्य नजर अब हमें तुरंत हर संभव वो उपाय करने होंगे जिनसे धरती का तापमान बढ़ने से रुके।

3. प्राणवायु दूषित हो गई है

दुनिया के 90 फ़ीसदी देशों में प्राणवायु दूषित हो गई है एवं इस मामले में भारत अव्वल है। हमारी राजधानी दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी है। यूनिसेफ और हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टिट्यूट (अमेरिका का एक स्वतंत्र गैर-लाभकारी शोध संस्थान) की रिपोर्ट “स्टेट ऑफ़ ग्लोबल एयर” की ताजा रिपोर्ट बढ़ते वायुप्रदुषण के खतरों की ओर आगाह करती है। इस रिपोर्ट में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि वर्ष 2021 के दौर में जब कोरोना महामारी के चलते आमतौर पर सभी तरह का यातायात काफी समय तक बाधित रहा और वायु प्रदुषण ज्यादा नहीं था लेकिन फिर भी दुनिया में वायुप्रदुषण के कारण 84 लाख मौतें हुई जिनमें से 21 लाख यानी एक चौथाई मौतें भारत में हुई थी। वायुप्रदुषण को लेकर पिछले दिनों आई एक अन्य रिपोर्ट में चेताया गया है कि जहरीली हवा का यही हाल रहा तो भारतीयों में औसत उम्र 6 साल कम होने का खतरा पैदा हो जाएगा। इस मामले में अब हमारी चुप्पी सबके लिए घातक सिद्ध होगी। हवा में घुलते इस जहर की तस्वीर बेहद चिन्ताजनक है। वायुप्रदुषण के इस जहर का असर कम करने के लिए सख्त कानून-कायदे बनाकर सजा और जुर्माने तक के प्रावधान भी खूब हुए हैं, लेकिन असली जरूरत जन-जागरूकता की है।

4. ग्रीन एनर्जी से हरित पर्यावरण बनाना है

ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देकर परिवहन और उद्योगों से निकलने वाली दूषित गैसों को कम करना पर्यावरण के सुधार में बहुत कारगर उपाय साबित होगा। हमें जीवाश्म ईंधनों के स्थान पर ऊर्जा के वकैल्पिक स्रोतों के उपयोग में बढ़ावा देना हैं। हमारे पास अक्षय ऊर्जा के कई प्राकृतिक स्रोत जैसे कि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल ऊर्जा इत्यादि है। जैसे ही हम इन पर ज्यादा निर्धारित रहेंगे हमारे तापमान में भी कमी आएगी, वातावरण में जहरीली गैसों का स्तर भी घटेगा और प्राणवायु की गुणवत्ता भी ठीक रहेगी। एयर कंडीशनर और दूसरी कूलिगं मशीनों के इस्तेमाल को भी थोड़ा कम करना होगा एवं ऐसी मशीनें बनानी होगी जिन से सी.एफ.सी.गैसें कम निकलती हो। सौर ऊर्जा के लिए सोलर पैनल सिस्टम लगाने पर सरकार की तरफ से सब्सिडी दी जाती है अतः हमें सोलर रूफटॉप प्लांट जरूर लगवाने चाहिए।

जलवायु परिवर्तन के दुषप्रभावों को कम करने के लिए केंद्र सरकार और राज्यों की सरकारों ने जो प्रयास किए हैं उनमें भी समय के साथ तेजी लाने की जरूरत है।

5. प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना होगा

प्लास्टिक प्रदुषण पूरी प्रकृति का दम घोट रहा है। सबसे दुखद बात यह है कि यह हमारी खाद्य श्रंखलाओं में पूरी तरह से घुस चूका है। प्लास्टिक में 16000 से भी अधिक केमिकल होते हैं एवं इनके माइक्रो एवं नैनो प्लास्टिक कण हर जीव जंतु को नुकसान पहुंचाते हैं। प्लास्टिक के समान को नष्ट होने में 20 से 1000 वर्ष तक लगते हैं एवं इस दौरान इसके सूक्षम प्लास्टिक तत्व उत्पन्न होते हैं जो भी बहुत जहरीले हैं। प्लास्टिक का कचरा समुद्री वन्य जीवों के लिए भी घातक है, यह हमारी मिट्टी को नुकसान पहुंचा रहा है और भूजल को भी जहरीला बना रहा है। आज ऐसा कोई जीव नहीं है जिसके स्वास्थ्य पर प्लास्टिक के कचरे के गंभीर प्रभाव नहीं हो रहे हो। जो जानवर गलती से प्लास्टिक खा जाते हैं उनकी अक्सर मोत हो जाती हैं।

प्लास्टिक कचरे की रोकथाम के लिए अप्रैल 2024 में ओटावा, कनाडा में 175 देश के प्रतिनिधि पहली बार मिले एवं कई ठोस सुझाव दिए हैं हालांकि इसका समाधान बहुत टेढ़ी खीर है। वर्तमान में 6 बिलियन टन से भी ज्यादा प्लास्टिक कचरा हमारी धरा पर है (The Lancet 2023) और करीबन 350 मिलियन टन कचरा हर वर्ष और जनरेट हो रहा है। समस्या बेहद गंभीर है।

अब समय आ गया है कि हम अपने अस्तित्व और पारिस्थिति के तंत्र की भलाई के लिए हर रोज पृथ्वी को बचाने का प्रयास करें एवं कुछ न कुछ तो ऐसा करें जिससे प्लास्टिक का इस्तेमाल कम हो। आपका एक छोटा सा कदम जैसे की आप जब भी घर से बाहर जाएं तो कपड़े या जूट का बैग साथ लेकर निकले एवं दुकानदारों से पॉलिथीन में सामान ना ले। अपने घर से पानी कांच या स्टील की बोतल में लेकर ही निकले। ऐसे कई छोटे-छोटे कदम है जो हमें तुरंत अपनाने होंगें। प्लास्टिक कचरे की रोकथाम के लिए जो भी आदेश हमें सरकार से मिलते हैं उसका पूरा पालन करने की कोशिश अवश्य करें। इस प्रदुषण को खत्म करने के लिए जीरो वेस्ट लाइफस्टाइल अपनानी होगी।

earthday.org ने 2040 तक प्लास्टिक उत्पादन में 60% की कटौती की वकालत की है जो हमारे अस्तित्व और तमाम परिस्थिति के तंत्रों की भलाई के लिए जरूरी है। प्लास्टिक के साथ हमारे रिश्ते को फिर से परिभाषित करें। हमें यह समझना होगा कि सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर पहल के बिना कुछ नहीं हो सकता क्योंकि यह बहुत ही जटिल मामला है।

वर्तमान में प्लास्टिक की पूरी रोकथाम नामुमकिन लगती है लेकिन इसमें कमी अवश्य की जा सकती है और वही सही कदम होगा।

6. ध्वनि प्रदुषण

आज हम कल-पुर्जों और तेज आवाज के उपकरणों के जरिए ध्वनि प्रदुषण पैदा कर रहे हैं। यातायात तथा मोटर गाड़ियों की चिल्लपों, कल-कारखानों का शोर एवं लाउडस्पीकरों की कर्णभेदक ध्वनि से बहरेपन, तनाव, उच्च रक्तचाफ, हृदय संबंधी रोग एवं मानसिक रोगों में बढ़ोतरी हो रही है। नींद, एकाग्रता और पूरा शरीर ध्वनि प्रदुषण से प्रभावित होता है। भारतवर्ष में ध्वनि प्रदुषण की रोकथाम को प्राथमिकताओं में नहीं रखा गया है। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट तक की व्यवस्था सिर्फ रात 10:00 बजे के बाद शोर को वर्जित करती है। दिन में शोर कितना नुकसान पहुंचा रहा है इस पर भी सभी अंगों को ध्यान देना होगा और इस नुकसान को कम से कमतर करने के उपाय भी, हमारी खुद की सुरक्षा और प्रकृति की बेहतरी के लिए जरूरी हो गए हैं।

7. वैचारिक प्रदुषण

वैचारिक प्रदुषण हर प्रदुषण की जड़ है। वर्तमान में कुछ अपरिपक्व एवं नैतिकता की कमी वाले इंसानों के दुष्विचारों की वजह से ही पूरे विश्व में जगह-जगह दंगे, आतंकवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार एवं अन्य सब सामाजिक बुराइयों का बोलबाला है। वैचारिक प्रदुषण वाले कुछ लोग इंटरनेट व अन्य मीडिया स्रोतों पर अफवाहें फैला कर हर जगह शांति भंग करवा रहे हैं। अच्छे संस्कार, सकारात्मकता एवं भाईचारा की भावना की कमी से मानव छल, कपट, इर्ष्या, क्रोध, अहंकार से ग्रसित होकर न केवल स्वयं अपित पूरे विश्व का नुक्सान करता रहता है। दुर्भाग्यवश वर्तमान में कई पढ़े-लिखे एवं ऊंचे तबके के लोग भी बेहद स्वार्थी होकर वैचारिक प्रदुषण फैला रहे हैं। वैचारिक प्रदुषण से बचने के लिए हमें हमारे विचारों को शुद्ध करना होगा, अच्छे संस्कार ग्रहण करने होंगे,अच्छे लोगों के संपर्क में रहना होगा । सही, नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा पर जीवन के हर मोड़ पर जोर देते रहने से वैचारिक प्रदुषण की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।

8. निष्कर्ष

इसमें दो राय नहीं है कि जलवायु परिवर्तन की समस्या ने आज के दौर में भयानक रूप अख्तियार कर लिया है। इसका मुकाबला आसान नहीं है। इसके लिए हरेक को कार्बन उत्सर्जन की कमी लाने के प्रयास करने होंगे।

जलवायु परिवर्तन के मुद्दों के लिए सभी देशों को जुड़ना होगा क्योंकि बिना अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के इसमें ज्यादा कुछ नहीं हो पाएगा। धरती मां को खुशहाल, जीवन दायिनी और उर्वरक बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि हम सभी अपने आहार, व्यवहार व जीवनशैली को परिस्थिति के अनुकूल ढालें और अपने सुखद एवं समृद्ध भविष्य का निर्माण करें। बेहतर जीवन के लिए परिवर्तन की प्रथम कड़ी स्वंय से ही प्रारंभ होगी। हमें अब पर्यावरण के मुद्दे पर उदासीन नहीं रहना है। हमारी थोड़ी सी लापरवाही से आगे की पीढ़ियों को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। राजनैतिक दलों को भी पर्यावरण के मुद्दों पर हमें घेरना जरूरी हो गया है।

आज यह बहुत जरूरी है कि हम अपनी असली विरासत यानी की पर्यावरण को संभाले। पर्यावरण की टूट-बिखर रही कड़ियों को पुनः जोड़े। हममें से प्रत्येक मन-वाणी-कर्म से इस सत्य को वेदकालीन महर्षियों के स्वर में स्वर मिलाकर सस्वर उद्घोष करें – ॐ धौ: शांतिरन्तरिक्षॅं शांति:, पृथ्वी शांतिरापः शांतिरोषधय: शांतिः। जब हम अपने आचरण, व्यवहार से माता प्रकृति के कोप को शांत करेंगे तभी हमारा जीवन भी शांत और सुखी होगा।

मातृस्वरूप हमारी प्रकृति के पास हमारी मुख्य जरूरतों के लिए सब कुछ है लेकिन मानव के बेतहाशा लालच के आगे यह मजबूर होकर पीड़ा भुगत रही है।

सत्यं, ब्रहदतमगु ग्रंदीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञ: पृथ्वीं धांरयन्ति ।
सा नो भूतस्य भव्यंस पत्न्यरूुं लोकं पृथ्वीं न: क्रृणोत ।।

अथर्ववेद 12/1/1

भावार्थ

पर्यावरण संरक्षण के लिए मनुष्य के अंदर सत्य, मृदु(दयालुता), संकल्प, तप तथा ज्ञान के गुणों का होना बहुत ही आवश्यक है। इन्हीं गुणों से ही पृथ्वी का संरक्षण किया जा सकता है।

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1 Comment

  1. श्रीनिवास स्वामी

    बहुत अच्छी कविताएं

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