उचित विचार, उचित वाणी तथा उचित क्रिया है पुण्य,
अवश्य होगी भलाई सत्य, शिव,तथा सुन्दर से जुड़ने पर
जो दूसरों की बुराई चाहता है वह होता है हर खजाने से शुन्य
हर धर्म के अच्छे उपदेशों को अपनाता है पुण्यात्मा,
सदगुण संपन्न मनुष्य देता है हर मानव को बराबर का दर्जा
हर धर्म के अनुयायी में वह तो देखता है अपना ही परमात्मा
ऐसे चित की शुद्धता व पवित्र ह्रदय वाले होते हैं धर्मात्मा ।
धर्मी ढूंढता है खुद के दोषों को, पापी करता है नुक्ताचीनी औरों पर,
ज्ञान तथा विवेक के अभाव से ही होता है मनुष्य पापी
लालच, स्वार्थ, ईर्ष्या व घमंड है हर कुकर्म की जड़, ध्यान रखना इन पर ।
उच्च नैतिकता पर चलना व अनेकता में एकता बनाए रखना,
मानवता को दिव्यता की ओर ले जाना जारी रखना ।
जरूर कमा लोगे पुण्य करके दूसरों की भलाई,
पाप पुण्य का मर्म समझाती है तुलसीदास जी की चौपाई ।
“परहित सरिस धर्म नहीं भाई
पर पीड़ा सम नहीं अधमाई”
मत बन जाना अपराधी कराके झगड़े – फसाद (1)
युद्धों के चलते हुए कैसे हम सब व विश्व रहेगा आबाद?
संदर्भ
- युद्ध मनुष्य के प्रति मनुष्य द्वारा थोपा हुआ सबसे बड़ा अपराध है । — महात्मा जरथुश्त्र (पारसी धर्म के संस्थापक जिन्हें यूनानी लोग जोरोस्टर कहते थे। )
लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत
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