मृत्यु है अंतिम परम सत्य जो कराती मुक्त हर बंधन से,
डरना क्यों जब बच नहीं सकते किसी चीज़ से।
नहीं जान पाओगे कब और कैसे होगी, पर होगी जरूर,
करते रहना तैयारी, पर फिक्र मत करना मेरे हुज़ूर
चिंता तो अवश्य कर देगी अधमरा जीने को मजबूर।
पूर्ण आनंद उठाना वर्तमान के हर क्षण का,
जीवन के विशाल समुद्र में रहना हरदम आशावादी
करते रहना चिंतन हर सांस के साथ खुशीमय जीवन काल का।
जरूर रोकना भटकाव करके वश में मन व मोह को,
हो जाएगा निर्वाण अगर करते रहोगे सब कर्म समर्पण अपने ईश्वर को।
जिन योद्धाओं ने गले लगायी मृत्यु को
अपने सत्य कर्म धर्म के लिए,
वे तो आसानी से कर गए पार इस भवसागर को
व हो गये अमर सदा के लिए।
सक्षम नहीं हूँ, स्वर्ग-नर्क व आत्मा के बारे में कुछ लिखने को,
ताउम्र स्वर्ग में वे जरूर रहे हैं जिन्होंने कष्ट नहीं दिया औरों को
लालची, पथभ्रष्ट व दुष्ट तो पाप जरूर कमाते हैं ताउम्र।
और दे जाते हैं मरणोपरांत घोर आपदाएं सारे परिजनों को।
सटीक राय-धन, जायदाद का बंटवारा ठीक रखना,
चूक मत जाना, त्रुटिहीन वसीयत जरूर बनाना
ताकि ना पड़े औलादों को कोर्टों के चक्कर लगाना।
मर्द हो तो कह देना, अर्धांगिनी से,
ना तोड़े चूड़ियां पत्थरों से, न हटाए बिंदिया ललाट से
नारियों जरूर सुनिश्चित करना
पिया ना भरे नयनों को अश्रुओं से
जरूर कहना संतानों से नहीं आऊंगा वापस बेतुके दान-पिंडों से।
शब्दों की कमी हैं, अग्रजों व माँ-बाप की पीड़ा के लिए,
अनहोनी तो होती रही है, शायद वे माफ़ करे इसके लिए।
यकीन है, चालू रखेंगे यार दोस्त महफ़िलें पूरे जोश-खरोश से,
वैसे भी कोई नहीं रुकता किसी के भरोसे।
ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)
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