सपने में देखा मेरी शव यात्रा निकलते हुए,
भ्रम में था जगत सुना हो जाएगा मेरे बिना
स्तब्ध रह गया देख भीड़ मेरी जगह लेने के लिए।
कितने अँधेरे में जीता है मानव,
क्या-क्या जाल बिछाकर मचाता है तांडव।
स्वप्न सीख दे गया मत पड़ो झूठे घपलों में,
तुरंत सुधरो पकड़ो सच को इसी जीवन में।
वरना आत्मा तड़पेगी सुनकर अंतिम गीत,
“राम नाम सत्य है सत्य बिना गति नहीं”
मिटटी में मिटटी मिलेगी तब देर हो जायेगी, मेरे मीत।
खुश हुआ मैं, जब सुना कुछ को कहते नेक था बंदा,
अधिकतर तो कर रहे थे मोबाइल पर अपना-अपना धंधा।
देखा जमघट कई कपल क्रियाओं का मरघट में,
बहुत कम के थे असली अश्रु नयनों में।
कुछ बौछार कर रहे थे घड़ियाली आंसुओं की,
बहुतों को तो जल्दी थी घर वापस लौटने की।
हाँ, मैं खुश नसीब था, मुझे चार अपनों ने उठा रखा था,
मैंने वह मंजर भी देखा जहाँ मुर्दों का ढेर लगा था
उनके अपनों ने उन्हें नकारा था
कोरोना काल में यह दर्दनाक नजारा आम था।
सपना दिखा गया असलियत,
शायद मेरे भी काँधे गायब होते
मुझे कोरोना नहीं था यही थी हकीकत।
मेरी आँखों में आंसू, अजीब नजारा था
कामिनी, कंचन, कीर्ति के लोभ से मुक्ति नहीं पाई
मरघट पर यह अंतिम असली अफ़सोस था
बहुत देर हो गई, अब वक्त कहाँ था ?
सारा भ्रम टूटा, गलतफहमियां दूर हुई,
दोष दूसरों को देता रहा, मेरा कसूर भी कम नहीं था
देर से ही सही स्थिति साफ़ हुई।
सपना सच्चा व व्यवहारिक था,
झूठ व मिलावट का कोई भी अंश नहीं था।
भाइयों बहनों, सीख जरूर लेना,
वरना पड़ेगा अंतिम समय पछताना।
एक दोस्त आया भागता हुआ, यात्रा में शामिल होने के लिए,
जोर से बोला “वसीयत में इनकी इच्छा थी देह-दान की”
मान गए सब, रखा मुझे लकड़ी वाले ट्रक में
हो गए सब गायब, चली गाड़ी मेडिकल कॉलेज के लिए।
सब बोल रहे थे, होने दो इनकी अंतिम इच्छा पूरी,
मैं खिलखिला उठा चलो एक मन्नत तो नहीं रही अधूरी
सन्दर्भ
- हिन्दुओं में जब शव को ले जाया जाता है तो लोग रास्ते भर “राम नाम सत्य है” बोलते जाते हैं।
- “और अपने माथे के पसीने की रोटी खाया करेगा और अंत में मिटटी में मिल जाएगा; क्योंकि तू उसी में से निकला है, तू मिटटी तो है और मिटटी में ही फिर मिल जाएगा।” — पवित्र बाइबिल, उत्पत्ति (Genesis) 3 – 19.
- सब एक स्थान से आते हैं; सब मिटटी से बने हैं, और सब मिटटी में फिर जाते हैं। — पवित्र बाइबिल, सभोपदेशक (Ecclesiaste) 3 – 20.
- मृतक को अपने कन्धों पर उठाकर दाह-संस्कार के लिए ले जाने वालों को “काँधे” कहा जाता है।
ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)
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