यह नन्हीं पुस्तिका ज़्यादातर मेरे जीवन के कुछ खट्टे-मीठे अनुभवों पर आधारित है।

जीवन एक संग्राम है व यह आसानी से नहीं चलता है। सच्चाई यह है कि हर मानव की जिंदगी में एक न रुकने वाला महाभारत, उसके अंदर मौजूद देवताओं व असुरों की सेनाओं के बीच चलता रहता है। मनुष्य को मोटे तौर पर तीन क्षेत्रों में लड़ाई लड़नी पड़ती है। पहला क्षेत्र प्रकृति है, दूसरा क्षेत्र जहाँ मनुष्य-मनुष्य से लड़ता है और तीसरा जब मनुष्य अपने आप से लड़ता है। यह तीनों रणभूमियां हमें हर दम घेरे रहती है। प्रकृति का मतलब गरीबी में जन्मना, गर्मी, भूकंप, अकाल, हमारा पर्यावरण, बीमारियां इत्यादि है। मानव की मानव से लड़ाई के कुछ ज्वलंत उदाहरण हैं – माप-बाप की गलत सोच (जिससे वे पुत्री को जन्मने ही नहीं देते या कैसे न कैसे मार देते हैं, या नकार देते हैं) व माप-बाप का ईमानदार न होना। इस तरह के वातावरण में दूसरा मानव (खास तौर पर उनके बच्चे) कई बार जीवन के संघर्ष में हार जाता है।कुछ बिरले ही होते हैं जो इस प्रकार के माहौल को मात देकर अपना उत्थान कर लेते हैं। जीवन में कई बार गलत शिक्षक, अपरिपक्व जीवनसाथी, गलत दोस्त / सहपाठी, टेढ़ा-मेढ़ा बॉस, भ्रष्ट नेता व निट्ठले (अकर्मण्य) सरकारी कर्मचारियों से भी जूझना पड़ता है। इन सब से निपटने के लिए कुछ विशेष तैयारी तो हमें करनी ही पड़ेगी और जोरदार इंसान तैयार करने पड़ेंगे।

मानव की सबसे बड़ी उपलब्धि तो तब होती है, जब वह अपने आप पर जीत हांसिल कर लेता है एवं अपने गलत व पुराने विचारों को बदल कर सकारात्मक रुख अपनाता है। यह ज्ञान आता है – प्रेरक व सद्विचारों से, बचपन से ही आध्यात्म से जुड़ाव व चरित्र निर्माण पर ध्यान देने इत्यादि से। हमें आशा है कि इस पुस्तक में लिखे हुए मेरे कुछ अनुभवों व सुझावों से आपको थोड़ी बहुत मदद जरूर मिलेगी। कई अन्य कड़वे व जटिल अनुभव एवं विवरण जैसे बेईमान व कठिन सहकर्मी और अधिपति (Boss) के साथ काम करना और उनके साथ रहना, जो हरेक इंसान के साथ होता है, मैंने जान-बूझकर नहीं लिखे है क्योंकि उनसे कड़वाहट ही पैदा होगी। मैं यह भी स्वीकार करने में नहीं हिचकिचाऊंगा कि मेरे में हर हादसे को बयां करने का साहस भी नहीं है। बीते हुए कड़वे अनुभवों को भुलाने में ही फायदा होता है। किसी ने बहुत ठीक कहा है – “Few things are better left untold” – कुछ बातों को नहीं बताना ही ठीक होता है।

मैं, मेरे अनुज श्री रामनिवास का बहुत आभारी हूँ। उन्होंने अपने व्यस्त जीवन के बावजूद लेखन की कई कमियां सुधारी व तथ्यों का सही आंकलन करने में सकारात्मक भूमिका निभाई है। उनके योगदान के बिना यह काम संभव नहीं था। मेरे दूसरे भाई कर्नल (डॉक्टर) चंद्रशेखर का भी हृदय से आभारी हूँ, उन्होंने भाई रामनिवास, मेरे पुत्र गिरीश, भतीजे नरेश, एवं डॉक्टर ओजस्वी को वर्षों तक खुद के पास रखकर उनका शैक्षिक जीवन संवारा है। कुछ अध्यायों में कई आध्यात्मिक पुस्तकों से सन्दर्भ लिए गये हैं। एतदर्थ मैं सभी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ।

यह पुस्तक हमारी दादीजी श्रीमती नाथीदेवी भाँवरियाँ को समर्पित है। उनकी जीवनशैली एवं आशीर्वाद से जो प्रेरणा मिली, उसी से हम सब फले-फूले एवं थोड़ा कुछ जीवन में हांसिल किया। भगवान ने अपने दर्शनार्थ स्वयं का सांसारिक रूप “दादी/माँ” हमें दिया है ताकि हम रोज उनके दर्शन व भक्ति कर सकें।

इस पुस्तक के लेखन का उद्देश्य मानव मात्र के लिए थोड़ा मार्गदर्शन करना है ताकि वह अपनी असीम ऊर्जा को सही रास्ते लगाकर अपना व विश्व का कल्याण कर सकें।

मैं, मेरे टाइपिस्ट मित्र श्री मुरली कुमावत, 15, अनुपम विहार, करणी पैलेस, पांच्यावाला, जयपुर का आभारी हूँ जिन्होंने मेरी टूटी-फूटी लेखनी को मुद्रण करके आपके सामने पेश की है।

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