थोड़ा क्रोध है स्वाभाविक नुकसान होता है इसकी अति से,
अनावश्यक गुस्सा है असभ्यता व अज्ञानता की निशानी
यह अक्सर अभिव्यक्त होता है कुकर्म व कठोर वाणी से ।
यह तुरंत बना लेता है मानव को अपना निशाना,
इसका अंजाम सदैव होगा शर्मिंदगी व खतरनाक पछतावा
घेर लेगी कई समस्याएं गर बन गए क्रोध के हाथ का खिलौना ।
क्रोध ही पैदा करता है राग, द्वेष, घृणा जैसे अनेकों दुश्मन,
गुस्सा ही करवाता है हम से कई तरह के अनिष्ट
हम खुद ही अपने दुश्मन होंगे जब क्रोध के अधीन होगा मन ।
शेख फरीद के दोहे गुरुवाणी में बताते हैं क्रोध से बचने के उपाय,
सब जानते हैं गुस्से का दुष्प्रभाव होता है शरीर के हर अंग पर
ग्रंथ साहिब में है सम्पूर्ण स्वास्थ्य को चंगा रखने की राय (1)
महात्मा बुद्ध कहते थे – क्रोधित स्वयं पीता है विष का प्याला,
और विडंबना देखो कि वह सोचता है मरेगा सामने वाला ।
मत होना दुखी जब नकारे आपके अधीनस्थ आपकी हिदायतें,
क्रोध के आवेश में ना ले कोई निर्णय, साध लेना मौन
जरूरी नहीं आपके विचार, धारणाएं हमेशा हो सत्य
मत होना विचलित इस मामूली से प्रकरण से
वरना होगा मनमुटाव, जरूर बिगड़ेंगे आपके सारे रिश्ते-नाते ।
बिखर जाते हैं घनिष्ठतम रिश्ते क्रोधावेश के कर्कश शब्दों से,
बच जाओगे नुकसान से अगर नियंत्रण कर ली वाणी
फायदे में रहोगे करके उन्हें क्षमा और मांग कर माफी उनसे ।
क्रोध है दुश्मन धर्म, यश, रूप, ज्ञान और ऐश्वर्य का,
भगवत गीता में विस्ततृ विवरण है क्रोध के नुकसानों का (2)
लेना सब्र से काम, आदत डाल लेना लोगों को माफ करने की,
मत बन जाना झगड़ालू और अपराधी होकर क्रोध के अधीन (3)
बनो पाक इंसान समझ कर आयतऺे कुरान मजीद की (4)
संदर्भ
- फरीदा बुरे दा भला करि गुसा मनि न हढाइ ॥
देही रोगु न लगई पलै सभु किछु पाइ ।।७८।।
अर्थ – हे फरीद जिसने तुम्हारे साथ बुरा किया है उसके साथ अच्छा करो और अपने दिल में क्रोध मत पालो तभी ही कोई भी बीमारी तुम्हारे शरीर को परेशान नहीं करेगी और सभी सुख तुम्हारे होंगे ।
जी जी 1381-82
- क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मतिृविभ्रमः।
स्मतिृभ्रंशाद बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।
भावार्थ – क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मतिृ में भ्रम हो जाता है, स्मतिृ में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है ।
श्रीमद्भगवत गीता 2-63
- क्रोध करने वाला मनुष्य झगड़ा मचाता है और अत्यंत क्रोध करने वाला अपराधी भी होता है ।
पवित्र बाइबल, नीति वचन 29-2
- जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील कर्मों से बचते हैं और अगर गुस्सा आ जाए तो माफ कर जाते हैं । ……. अलबत्ता जो व्यक्ति सब्र से काम ले और माफ करें तो यह बड़े महत्वपूर्ण कर्मों में से है ।
कुरान मजीद – सूरह ,अश-शूरा 42,37-43
लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत
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