प्रकृति का सम्पूर्ण ऋण चुकाना मुश्किल होता है एक जीवन में,
कोशिश की मैंने अभिभावकों व गुरुओं की सेवा करने की
कहीं न कहीं कमी रह गयी इन प्रतिक्रियाओं में
अब देर हो गयी है, नहीं हो सकता उऋण उनकी कृतज्ञता से
जीवनसाथी का कर्ज़ा भी है रह गया बकाया भागा-दौड़ी में।
यार-दोस्तों की मदद जीवन भर अहम रही थी,
कई और भी थे जो करते रहे हैं बेशुमार सहायता
उनकी उदारता की भरपाई करना काफी मुश्किल थी
सृष्टि ने सब कुछ दिया मुझे आनंदित व सफल होने को
पेड़ लगाने व पर्यावरण की रक्षा हेतु कुछ कोशिश की थी
क़र्ज़ कोई नहीं उतार सकता जल, हवा, पृथ्वी व सूर्य का
मेरी सारी कोशिशें तो समंदर में एक बूँद डालने जैसी थी।
राष्ट्र ने पढ़ाया, लिखाया और लथ-पथ किया सम्मान से,
बन पाया था छोटा सा चिकित्सक इसी की मेहरबानी से
कर पाया कुछ देश के रक्षकों की सेवा चालीस वर्षों तक
कमाया कुछ अर्थ किया लालन-पालन परिवार का आसानी से।
कोशिश जारी है कि कर दूँ हिसाब बराबर राष्ट्र का भी,
कर रहा हूँ कुछ मरीज़ों की सेवा जो भी बन पाती है मुझसे
डगर बेहद मुश्किल है बंद नहीं होगा यह खाता भी।
हिसाब बकाया है भाई-बंधुओं व बच्चों की मेहरबानियों का,
समझ नहीं पा रहा हूँ कैसे उऋण होऊंगा इनकी उदारता से
देखो ना, भूल गया हूँ बहुत बड़ा फ़र्ज़ – क़र्ज़ उतारना शवों का
उन्हीं की चीर-फाड़ से ही सीखी थी चिकित्सा की बारीकियां
वही थोड़ा सा ज्ञान आज तक साधन बना हुआ है रोजी रोटी का
गुहार लगा रहा हूँ प्रभु से की वह रखें इस देह को ठीक-ठाक
ताकि हो सके देहदान व कुछ तो क़र्ज़ उतरे उन आत्माओं का।
ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)
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