सर्वशक्तिमान परमेश्वर का आशीर्वाद हम सब पर बना रहे।
जो ज्ञान मेरे गुरुओं ने, माता-पिता ने मुझे प्रदान किया और जो मैंने किताबों में पढ़ा व थोड़ा बहुत संसार से सीखा, वे सब बातें मैं केवल निमित्त बनकर मेरे उन भाई-बहनों के लिए लिख रहा हूँ जिनको औपचारिक शिक्षा गृहण करने का ज्यादा अवसर नहीं मिल पाया। इससे यदि वे अपने जीवन को लम्बे समय तक निरोगी व सुखी रख सकें तथा साधारण जनता को इसका थोड़ा भी लाभ मिल सके तो मैं इसे ईश्वर की सेवा में मानव जीवन के लिए किया जाने वाला छोटा सा किन्तु सार्थक प्रयास मानूंगा।
मैंने भाषा को बहुत ही सरल रखने की कोशिश की है ताकि सारगर्भित बात भी आसानी से समझ मे आ जाये।
बड़े संत महात्माओं की वाणी को पढ़ना, लिखना व सुनाना ही सत्संग है। इससे अपने अंदर स्थित परमात्मा की ओर जाने की प्रेणा मिलती है।
इस सद्प्रयास में मेरे भाई श्री रामनिवास एवं उनकी धर्मपत्नी युगेन्द्रबाला का बहुत योगदान है।
इन दोनों ने मिलकर इस किताब की प्रूफ रीडिंग की एवं लेखन की त्रुटियां सुधारी है
इसके लिए मै सर्वदा उनका आभारी रहूँगा। मेरे पुत्र गिरीश एवं पुत्रवधु उर्मिला का सहयोग भी बहुमूल्य रहा। उन्होंने मुझे हमेशा आगे बढ़ने एवं अध्यात्म से जुड़ने के लिए सहयोग किया है। कुछ अध्यायों मे कई आध्यात्मिक पुस्तकों व पत्रिकाओं से सन्दर्भ लिए गये हैं, एतदर्थ मैं सभी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ । मैं माननीय श्री महावीर प्रसाद शर्मा जी (ग्राम – नाटास, जिला – झुंझुनू, राजस्थान, पूर्व निदेशक, खादी ग्रामोद्योग आयोग, भारत सरकार) का बहुत आभारी हूँ। उन्होंने इस पुस्तक के लिए बेहद सटीक सुझाव दिये।
मेरे इस प्रयास में जो त्रुटियां या कमियां है उसके लिए मई क्षमा प्रार्थी हूँ। यह पुस्तक मैं मेरे गुरूजी ब्रह्मलीन स्वामी चिदानंद जी महाराज (द डिवाइन लाइफ सोसाइटी शिवानंद नगर, टिहरी गढ़वाल, उत्तराखंड) को समर्पित करता हूँ।
सभी पाठकों से मेरी ये प्रार्थना है कि जब भी वह किसी ढाणी, खेड़ा, मजरे, फलां या गाँव में रात्री विश्राम करें तो इस पुस्तक के किसी पाठ का वाचन वहां के अन्य भाई-बहनों के बीच आनंद व रुचिपूर्वक सहज भाषा में कर देवें। यत्र-तत्र से संगृहीत इन ज्ञान बीजों को दूर-दूर तक बिखेर कर हम जीवन को अर्थमूलक और आनंदमय कर सकेंगे। यही मेरा ध्येय है।
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