आती है हर पल व सांस के साथ नई-नई चुनौतियां,

नहीं आया पहला सांस तो ख़त्म है जीवन वहीँ पर,

बचपन में दुलार की कमी से आती है आपत्तियां।

जरूर टूटता है बचपन माँ-बाप के झगड़ों से,

ध्यान देना, बच्चे सीखते हैं हर शब्द अभिभावकों से

विनम्रता व मधुर शब्दों से ही बतलाना उनसे

कर्कश वाणी भर देगी उन्हें विकृत मानसिकता से

बच्चों की भाषा का सम्बन्ध है उनकी परवरिश से

हो रहा है दादा-दादी का मार्गदर्शन भी दुर्लभ,

निखरता है बचपन जब अभिभावक रहते प्यार से

बहुत कुछ सीखता है बच्चा घर की पाठशाला से,

महानता के बीज बचपन में ही बोए जाते हैं।

अर्ज़ है बड़े – बूढ़ों से परवरिश करना ध्यान से,

अच्छे स्कूल व शिक्षक जरूर संवारते हैं जीवन

छोड़ मत देना सब कुछ स्कूली शिक्षा के भरोसे।

बच्चों की गलत संगत भी बहा देगी उल्टी गंगा,

मोबाइल व बच्चों की गतिविधि पर हो निगरानी

थोड़ी भी चूक से जीवन का सौदा होगा महंगा।

बच्चों को गुमराह होने से जरूर बचाना,

हर तरह की भावनात्मक मदद का भरोसा देना

सुनिश्चित करना ताकि बच्चे रखें आप पर पूरा भरोसा

गलतियां माफ़ करना, मदद करने में देर मत करना।

हर तरह का सहारा देना दस से बीस वर्ष की उम्र में,

इस दौरान हॉर्मोन की वजह से होते हैं कई बदलाव

गलतियां कर बैठते है आकर इनके प्रभाव में

ध्यान रहे मानव बुराई तुरंत ग्रहण कर लेता है

देर नहीं लगती है कलयुगी भंवर के फंसने में।

आपको बनना होगा बच्चों का मित्र घनिष्ट

होगा प्यार, भरोसा तो कुछ भी नहीं छुपायेंगे आपसे

इसी से नहीं होगा भटकाव व कुछ भी अनिष्ट।

ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)