पलक लगते ही मैं पहुँच गया जन्नत के द्वार पर,
खोले पट दरबानों ने, दिखे देवता अपने आसनों पर
पहचान गया इंद्र देव, यीशु व रिजवाना* को
झट खड़े हुये, सबने दिया बराबर का आसान मुझको।
ख्वाइश की मैंने वहां के बासिंदों दे मिलने की,
हाज़िर हो गये सब, हुक्म हुआ पहचान करो अपनों की।
स्तब्ध रह गया जब नहीं दिखे
जो मेरे ख्यालों में थे वहां रहने लायक,
गलत था मेरा अंदाजा
वे थे वास्तविक खलनायक
प्रफुल्लित हुआ जब नज़र आये
बापू, लाल बहादुर, अब्दुल कलाम व अन्य महानायक।
चैन मिला जब दिखी सलमा बेगम **
छू गया यह दृश्य दिल को, सपने में भी भर आयी आखें मेरी,
कई अन्य महान हस्तियां भी थी बेहद नेक व प्यारी प्यारी।
हाँ, दिखी नाथी दादी, देवकी चाचा व सावित्री भाभी,
जो थी अपने काल की सच्ची विभूतियाँ
उन्होंने जीते जी ही कमा ली थी स्वर्ग की चाभी।
सुख चैन का दृश्य देख
इच्छा जाहिर की मैंने वहां रहने की,
नहीं स्वीकारी गयी यह पुकार
सोच रहा था दोबारा गिड़गिड़ाने की।
यह क्या टूट गया सुन्दर सपना
सुनकर मोबाइल फ़ोन के व्हाट्सप्प की टंकार
फ़ोन को बंद न करने की गलती महंगी पड़ी,
मैं बेपरवाह था इसकी तरंगो से
जिन्होंने नुकसान किया मेरी देह का रातभर
* स्वर्ग का संरक्षक
** हमारी कर्मठ, पाक व नेक खानसामी जो हमें बेहद प्यार से खाना खिलाती थी।
बेहद वेदना जरूर थी कि सुन्दर सपना टूटा अनघडी
अगर न टूटता खवाब व
न मिलती अनुमति दूसरी अर्जी पर
तो भी वहां और लुत्फ़ उठाता घडी दो घडी।
फिर लगी आँख व आया गजब का सपना
मैं देख रहा हूँ मेरी शव यात्रा जाते हुए,
सोचता था सूना हो जायेगा विश्व मेरे बिना
यहाँ तो भीड़ जमा हो रही है मेरी जगह लेने के लिए
बहुत कम दुखी थे मेरी शवयात्रा में जो शामिल हुए
बाकियों को देखा घड़ियाली अश्रु बहते हुए।
कितने अँधेरे में जीता है मानव,
क्या-क्या जाल बुनता है व मचाता रहता है तांडव।
स्वप्न सीख दे गया, मत पड़ो झूठें घपलों में,
तुरंत सुधरो व पकड़ो सच को इस जीवन में।
वरना आत्मा तड़प नहीं पायेगी सुनकर अंतिम गीत,
राम-नाम सत्य है – सत्य बिना गति नहीं
मिट्टी में मिट्टी मिला रहे हैं, अब कभी नहीं मिलेंगे मेरे मीत।
वाह रे मेरे मस्तिष्क मान गया तुझको
तू करता सपनों में भी अक्सर न्याय,
अब समझा तेरे मूल रूप में नहीं कोई अन्याय।
पर समझा नहीं क्यों कराता, जाग्रत अवस्था में धोखा-धड़ी?
मंथन करना होगा ऐसी नाकाम लतें तुझ में क्यों पड़ी ?
करना होगा सुधार व्यवहार व सोच विचार में,
और समय दूंगा सेवा व उपकार में,
फिर हाज़िर होऊंगा सपने में ही सही, सांचे दरबार में
शायद सुकून व पनाह मिल जाए
स्वर्ग व इसी भव्य जहाँ में।
मेरे अनमोल मस्तिष्क एक और है जरुरी बात,
डरावने सपने करते मुझे पसीने में तर
शुक्र हैं जान नहीं निकलती पर तू तो दे देता है असली मात।
जब लगे सब वास्तविक तो दिल हो जाता है बेहाल,
मत कर देना काल्पनिक माहौल से इसे हलाल
आशंका पूरी है, उस क्षणिक तनाव के आघात से
कहीं बंद न हो जाए मेरा दिल जो है असली लाल।
गूढ़ रहस्य सुनले, मत करना कोई गुमान,
दिल तेरे बिना कुछ दिन धड़क लेगा
पर तू होगा उसके बिना कुछ पलों का ही मेहमान
याद रख सुनले मेरा यह फरमान
तुझे सब पता है फिर भी कहूंगा
कभी अच्छा नहीं होता तनिक भी अभिमान
ज्ञात है सुनता नहीं तू आसानी से
व न लेता किसीसे खास ज्ञान
जानता हूँ तेरे पास है खुद का असीम खजाना
पर जानकर भी तू रहता अक्सर अनजान।
क्यों रखता तेरा बहुतेरा भाग सुषुप्त अवस्था में ?
क्यों होता आसानी से बेलगाम ?
अब श्रवण कर जरा ध्यान से
नहीं करने दूंगा तुझे और आराम।
मानता हूँ मैं नहीं बन पाउँगा कोई बुद्ध,
शर्तिया है सतत प्रयास व ध्यान से तू लेगा मेरी सुध।
ढूंढूंगा / मिलेगा असली गुरु
उनकी पनाह में लगाऊंगा सतत ध्यान,
आप व मेरे ध्यान के मिश्रण से
जरूर पाऊंगा मैं सुज्ञान।
ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)
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