(कर्म व अर्थ का मिश्रण)
विवाह के बाद होगा मधुर व सुगम जीवन गृहस्थ का,
बशर्ते की आप ले लो सबक एक दूजे को सहने का।
कमी ना हो पारस्परिक विश्वास व धैर्य रखने में,
मत होना खुदगर्ज़, रखना हमसफ़र का मान-सम्मान,
सीखना जगह देना, पूरक होंगे समाके एक दूजे में
हर हालत में बरक़रार रहे दुतरफा स्वतंत्रता,
इसी से बचेगी सम्बन्ध की पवित्रता।
वार्तालाप हो स्नेहमय में, सतर्क रहे बोलचाल में,
चुके गए तो देर नहीं लगेगी मन मुटाव होने में।
गृहस्थाश्रम है जीवन का आधारभूत व तपोभूमि,
इसी में संभव है कई आत्माओं का पवित्र मिलन,
रखना इसे वात्सल्य व त्याग की भूमि।
नासमझी से कई लोग बना लेते हैं इसे युद्ध क्षेत्र,
कर्म करना विवेकपूर्ण, हर कदम उठाए सावधानी से,
थोड़ी सी चूक से बन जाएगा यह कुरुक्षेत्र।
स्वार्थ और लालच से दूर, व्रतियां हो सही मार्ग पर,
सटीक हो मानसिकता, चलना त्याग की डगर पर।
सुझभूझ से गृहस्थी में रखना पूरी सावधानी,
ध्यान रहे स्वप्न में भी ना बोलें कड़वे वचन
अभिभावकों व बच्चों से भी रहना प्रेममय,
देरी ना हो क्षमा करने में, सेवा करने में हो तत्परता
इसी अवधि में चूका पाओगे मातृ-पितृ व अन्य ऋण,
सहनशीलता ही सुधारेगी साझेदारी की जिंदगानी।
सत्य, दया व दान ही है गृहस्थी का असली धर्म,
ध्यान रहे स्वप्न में भी ना हो आप से कोई अनुचित काम।
गृहस्थी में नियत है मानव का अस्तित्व व निरंतरता।
नैतिकता से धन कमाना है मानव का अहम कर्म,
बेईमानी का पैसा बिगाड़ेगा हमारी कई पीढ़ियां,
सब धर्मों ने माना है काला धर्म को खौफनाक अधर्म।
गृहस्थी का ही कर्त्तव्य है बनाना दो योग्य संतान,
यह माना गया है हमारा अहम फ़र्ज़
भूल ना हो इसमें वर्ना संतान बन जाएंगे शैतान।
कर देंगे आपका वर्तमान व भविष्य दोनों बर्बाद,
गृहस्थाश्रम ही नहीं पूरा चमन भी नहीं रहेगा आबाद।
ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)
Leave a Reply