जननी नहीं वह ईश्वर ही था जो समेटता
खिलता था अपनी गोद में।
शर्तिया है वह हर माँ के आँचल की ओट में
नौ महीने भी था मैं सुरक्षित उसके महान मंदिर में
उससे भव्य नहीं कोई देवालय पूरे जहाँ में।।
वो ही तो थी आमना, मरियम, कौशल्या व देवकी।
पूजते रहो माई को, होती रहेगी उपासना ईश्वर की।।
रब के ही तो रूप हैं माता-पिता व खरा शिक्षक।
यह सतगुरु ही रहे मेरे हर कठिन घड़ी में
पथ प्रदर्शक व रक्षक।।
ईश के दर्शन हुए पशु-पक्षियों में
जब देखा उन्हें अंडे-बच्चों को पालते हुए।
ऐसा नेक व निश्छल भाव कहीं और नहीं देखा
धरा पर होते हुए।।
चमचमाते बर्फ से ढके पर्वतों,
गगन में टिमटिमाते तारे भी रूप उसी का।
इंद्रधनुष, सुबह-शाम रवि की बहुरंगी,
अठखेलियां में भी वही वही मौजूद है।
परमानन्द देती चांदनी, बरसात की सुगंध,
गायकों, वाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनियाँ भी आभास कराती ईश्वर का
रवि, चंद्र संग मेघों की छुपा-छुपी में भी नहीं वह छुपता
सूक्षम्ता के रूप में वह छिपा है हर बीज में
अनुकूल परिस्थितियों में दर्शन देता
विशालतम बरगद व हाइपरियन (Hyperion) के रूप में
लहलहाते खेत, एक से एक सुन्दर पुष्प, फल में भी वही रमता
वही है सरहद पर लड़ते/डटे हुए
सैनिकों के मन का भाव
पहुंचे हुए साधु-संत व सद्कर्म करते मानवों में
नहीं उसका अभाव
यह सब ईश्वर के कई दुर्लभ रूप
नमन करो इन योद्धाओं को
यही है ईश्वर के असली स्वरूप
अब तो हमें हर जगह उसके अलावा कुछ दिखता नहीं
ब्रह्मानंद मिल गया, अब तनिक भी तृष्णा नहीं
ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)
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