सात्विक गुण संपन्न (दैवीसम्पदा)

(मानव ही सृष्टि का उद्धार करेंगे।)

वर्तमान में सम्पूर्ण जीव-जगत व पर्यावरण का जो पतन हो रहा है उसका मुख्य कारण मानव में आयी दैवीसम्पदा की कमी है। आज हर जगह डर, असुरक्षा, युद्धों की भीषण दहशत, बड़े राष्ट्रों द्वारा छोटे राष्ट्रों को हड़पने की लालसा, महामारियां, आबादी का विस्थापन, भुखमरी, बेरोजगारी, राजनीतिक अशांति, भूमंडलीय तापक्रम में वृद्धि के कारण मची तबाही जैसी समस्याएं मुंह बाहें खड़ी हैं।

मनुष्य की सोच व व्यवहार में सकारात्मकता, सात्विक, विश्व कल्याण, भाईचारा व प्रेम की भावनाओं को जाग्रत करना एक उपाय है। इसी तरकीब से दैवीसम्पदा की उपज होगी। यह मुद्दा हमारी मानसिकता के बदलाव से जुड़ा होने के कारण थोड़ा मुश्किल जरूर है परन्तु असंभव नहीं है। हमें अपने आचरण व शिक्षा के हर पड़ाव पर ध्यान केंद्रित करना होगा। संक्षेप में भला बनने व भलाई करने के लिए जो कुछ भी आचरण हम करते हैं, तरकीब अपनाते हैं, आदतें डालते हैं व शिक्षा लेते हैं, वे सारे गुण दैवीसम्पदा के ही भाग हैं। गीता में भगवान कृष्ण ने सोहलवें अध्याय के प्रथम तीन श्लोकों में दैवीसम्पदा से युक्त सात्विक पुरुषों के स्वाभाविक 26 लक्षणों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है जो इस प्रकार है –

  1. भय का सर्वथा अभाव
  2. अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता (शुद्धि) – “सत्वसंशुद्धि”
  3. तत्वज्ञान के लिए ध्यान व योग करना
  4. कर्त्तव्य समझकर निष्काम भाव से दान करना
  5. दमः – इन्द्रियों को वश में करना
  6. पूजनीयों की पूजा करना (यज्ञ:)
  7. स्वाध्याय
  8. तपः – अपने धर्म का पालन करना
  9. शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण की सरलता जिसे “आर्जव” कहा जाता है
  10. अहिंसा
  11. सत्य
  12. अक्रोध
  13. त्याग
  14. शांति
  15. “अपैशुन” – किसी में भी दोष न देखना, निंदा व चुगली ना करना
  16. दया
  17. अलोलुपत्व – (दूसरों का विषयभोग करते देखकर उन विषयों की प्राप्ति के लिए मन का ललचा उठना “लोलुपता” है, इसके सर्वथा आभाव का नाम “अलोलुपत्व” है)
  18. लज्जा – (गलत आचरण करने में संकोच होना)
  19. मार्दव – (अन्तःकरण, वाणी व व्यवहार में कोमल हो जाना)
  20. अचापल – (बेमतलब बोलना, बेसिरपैर की बातें सोचना व व्यर्थ चेष्टाओं से बचने को अचापल कहते हैं।)
  21. “तेज” – यह श्रेष्ठ पुरुषों की वह शक्ति-विशेष है, जिसके कारण गलत प्रकृति वाले मनुष्य भी प्रायः अच्छे कर्म करने लगते हैं।
  22. “क्षमा”
  23. “धृति” – भारी से भारी आपत्ति, भय या दुःख उपस्थित होने पर भी विचलित न होना। इसी को धैर्य कहते हैं।
  24. “शौच” – पवित्रता का नाम शौच है, जो दो प्रकार की होती है – बाहर की व भीतर की।
  25. “अद्रोह” – किसी के साथ द्वेष या शत्रुता का भाव न होना “अद्रोह” कहलाता है।
  26. “न अतिमानिता” – खुद को श्रेष्ट, बड़ा या पूज्य न समझने को “न अतिमानिता” कहा गया है। अगर ध्यान से देखें तो ये सारे लक्षण हमारे स्वभाव व मन की सोच / विचारों से जुड़े हुए हैं एवं हमें इनको अपने मन में उत्त्पन्न करना होगा।

हम जैसे ही सात्विक तप के लक्षणों को आत्मसात करने लगेंगे तो दैवीसम्पदा आसानी से हांसिल कर पायेंगे। इसके साथ – साथ शरीर सम्बन्धी तप (जैसे गुणीजनों का आदर, मन की पवित्रता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा) एवं वाणी सम्बन्धी तप (सत्य, वचन, प्रेमयुक्त मीठे हितकारी वचन) को अपनाना होगा। इन तपों के अपनाने से ही हमारा मन वश में रहेगा, शांत होगा व प्रसन्नता से भरपूर रहेगा। यह मन सबंधी तप ही तो है जिससे हम हमारी इन्द्रियों व शरीर पर जीत हासिल कर लेते हैं।

जिसने अपने आप पर जीत हासिल करली है, वह स्वयं का महान मित्र व उद्धारकर्ता बन जाता है। श्रीमदभगवत गीता के इस श्लोक पर गौर करें –

बंधुसरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।

अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवता।। 6-6

भावार्थ – जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है एवं जिसने यह जीत हासिल नहीं की वह स्वयं का शत्रु होता है क्योंकि उसका मन कल्याण के विपरीत आचरण करने लगता है।

दैवीसम्पदा कैसे हासिल करें : –

हमारी सारी गतिविधियां, कार्यशैली, आचरण व जो कुछ भी हम हासिल करते हैं वह हमारे मन (अंतःकरण) में उत्पन्न होने वाले भावों पर ही निर्भर करता है। ध्यान रहे – हमारी सबसे बड़ी दौलत हमारे मन में उपजने वाले श्रेष्ठ विचार ही हैं। मन को जीत कर उसे सद्विचारों से भरना है। सद्विचारों व आध्यात्मिक विचारों का गहरा सम्बन्ध है। यह एक दूसरे के पूरक हैं। इन विचारों के आते ही हमारे जीवन में सुख स्फुटित होने लगता है एवं नकारात्मकता ख़त्म हो जाती है। हमें, हमारे मन में उपजने वाले दुर्भावों को सात्विक तप द्वारा रोकना होगा। दुर्भावों के नष्ट होते ही दया, क्षमा, प्रेम, विनय आदि सदभाव विकसित होने लग जाते हैं।

हमें सब धर्मों का सम्मान करना सीखना होगा व हर धर्म के अनुयायियों को बिना किसी भेद-भाव के बराबर का दर्जा देना सीखना होगा। जब हमारे बच्चे हमें इस सत्य के साथ जीते हुए देखेंगे तो वे स्वतः यह सीख लेंगे एवं कभी पथभ्रष्ट समूह में शामिल नहीं होंगे और विश्व कल्याण में अपना योगदान जरूर करेंगे। जब हम औरों को बराबर का दर्जा देना सीख लेंगे तो स्वतः ही हम खुद को श्रेष्ठ या पूज्य समझना बंद कर देंगे। इसी भाव से हमें क्षमा करना व धैर्य धारण करने की आदत पड़ जायेगी, हम किसी को भी शत्रु नहीं मानेंगे एवं हमारी हिंसा-प्रवृति भी ख़त्म हो जायेगी।

महाभारत का यह वाक्य “अहिंसा परमो धर्मः” याद रखकर हमें दैवीसम्पदा से जुड़े रहना है। जब माता-पिता (अभिभावक) अहिंसा धारण करते हुए कभी भी लोभ, मोह या क्रोध के अधीन होकर किसी को भी कष्ट नहीं देते हैं तो उनके बच्चे किसी का भी बुरा नहीं चाहेंगे, कठोर वचन नहीं बोलेंगे व न किसी को हानि पहुंचायेंगे। इन्ही गुणों से मानव के अन्तःकरण में सात्विक प्रसन्नता उत्पन्न होती है एवं वह हर हालत में शान्तिधारण किये रहता है। जब हम शांतिमय होते हैं तो दूसरों में दोष देखना बंद कर देते हैं व किसी की भी निंदा नहीं करते हैं। इस दैवीसम्पदा के ” अपैशुन” कहा जाता है। शांतिप्रिय होने पर हम आपत्तियों, डर व दुःखों से विचलित नहीं होते हैं व न ही अपने धर्म और कर्त्तव्य से विमुख होते हैं। यही धैर्य हमारा आभूषण बन जाता है।

आज शांति से रहना, शांतिप्रिय होना व मित्रतापूर्वक माहौल बनाये रखना मुश्किल लक्ष्य लगता है लेकिन सक्रिय प्रयास से मानव सब कुछ हासिल कर सकता है। हमारी मनोदशा को नियंत्रित करके हम हर समस्या का समाधान करने में पूर्ण सक्षम हैं।

सार्वभौमिक स्थाई शांति व समृद्धि तभी संभव होगी जब हर राष्ट्र सभी के कल्याणार्थ एकजुट होकर निष्ठापूर्वक कार्य करेंगे। हर राष्ट्र अपनी विदेश निति व आर्थिक नीतियों में करुणा का मार्ग अपनाएंगे तो ही सच्ची शांति संभव होगी। वर्तमान में कई राष्ट्राध्यक्ष, दैवीसम्पदा विहीन होकर इस भ्रम में हैं कि वे सर्वशक्तिशाली होकर, दूसरे देशों को दबाकर या बर्बाद करके अपनी सुरक्षा, उन्नति व शांति में इजाफा कर लेंगे। हम उन्हें 2500 वर्ष पूर्व भगवन बुद्ध द्वारा दिया गया उपदेश याद दिलाना चाहते हैं – “कोई भी देश कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो जाए लेकिन उसकी सुरक्षा व शांति तब तक स्थिर नहीं होगी जब तक दूसरे देश असुरक्षित व अशांत है।”

“अभयं” (भय का सर्वदा अभाव निर्भयता) को गीता में दैवीसम्पदा के गुण को प्रथम स्थान दिया गया है –

अभयं सत्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवास्थितिः गीता – 16. 1

आज जो डर का माहौल बना हुआ है हमें उसके कारणों पर गौर करना होगा। भय अज्ञान का मूलक है व इसका मूल कारण हमारे द्वारा किये हुये पाप होते हैं। अगर हम निष्पापी व विलास रहित होकर दूसरों को भयभीत नहीं करेंगे व उनका शोषण करेंगे तो सर्वदा निर्भय रहेंगे। मनुष्य की वास्तविक अंतरात्मा महान है लेकिन डर, स्वार्थ, व रजो-तमो गुणों के प्रभाव से वह दीन-हीन हो जाता है। जैसे ही हमारा ज्ञान योग जागेगा, अन्तःकरण में शुद्धि व निर्मलता आयेगी, भगवान में दृढ़ विश्वास बनेगा और हमारा मन निर्भय हो जायेगा।

एक अहम बात यह भी है कि जब हम निष्कामभाव से दान करने की प्रवृति बना लेते हैं तो आत्मसंतुष्टि आ जाती है एवं अन्तःकरण प्रफुल्लित रहता है। यही तो हर मानव जीवन का ध्येय होता है।

सारांश ये है कि हमें हमारी शिक्षा निति पर ध्यान देना होगा। हमारा सतत प्रयास यह हो कि हर विद्यालय में बिना भेदभाव के हर धर्म व तबके के बच्चों को बराबर का दर्जा, सम्मान व अवसर प्रदान करते हुए जीवन की अहम सीख – आपसी सद्भाव व प्रेमपूर्वक जीवनयापन करने की मिले। सकारात्मकता पर पूरा जोर रहे। हमारे शिक्षकों की प्राथमिकता बच्चों में संकीर्णता के भावों को पूरी तरह हटाना, सामाजिक न्याय व सच्चे अध्यात्म से जुड़े रहने पर ध्यान केंद्रित करने की हो। यह सब नहीं होने की वजह से कई शिक्षक व उनके अनुयायी भी आसुरी प्रवृति, दम्भ, कठोरता व अज्ञान से भरपूर हैं। यदि पढ़ा-लिखा मानव शैतान प्रवृति से युक्त है तो वह खुद व समस्त विश्व के लिए घातक होता है। हमें दैवीसम्पदा वाले मानव बनाने का सतत प्रयास बचपन से लेकर अन्त समय तक करना होगा।

मुक्ति का रहस्य पवित्र प्रेम और परोपकार में ही छिपा हुआ है। इसीलिए प्रेम को अपना लेना चाहिए क्योंकि प्रेम ही परमेश्वर है। सूफी संतो का ह्रदय उद्गार इस तरह पुकार उठता है –

है इंसान का मजहब मुहब्बत-मुहब्बत। बढ़ाये यह आपस में रिश्ता-ए-उल्फत।।

ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)

Previous

युद्घ

Next

Interview with National TV

1 Comment

  1. Dilip Vadehra

    Excellent… yehi zindagi ka Sach hai
    ..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

© shivrammehta.in 2026. All Rights Reserved.