मसला है धर्म और आस्था का, कुछ लिखना होगा टेढ़ा काम,

बहुत लोगों को लगेगा बुरा, दिखाएंगे आंख और होंगे नाराज

माफ करना मुझे, करबद्ध विनती है सरे – आम ।

मत शामिल होना आस्था के नाम पर जनसमूह में,

भीड़ के साथ अर्चना करने से नहीं मिलेगा अधिक आशीर्वाद

इबादत तो फलित होती है जब पूजा करते हो अकेले में

हर पल व जगह मौजद है ईश्वर, खासियत नहीं किसी दिन की

मत डालना जान जोखिम में आकर अंधविश्वास के चक्कर में

मनोरंजन, तीर्थ यात्रा शांति के लिए हो न की मरने – मारने को

जनसैलाब बढ़ेगा भविष्य में हर धर्म के व अन्य आयोजनों में

कोरोना जैसी बीमारी व अन्य महामारियों का डर रहेगा इनमें

अक्सर नेता भी शामिल हो जाते हैं आस्था के जनसैलाब में

झूठी आशा लगा लेते हैं पाप धोने और पुण्य कमाने की

आम जनता कैसे पीछे रहेगी जाने – मानों की नकल करने मे

पाप धोने के चक्कर में लोग गलतियां हरदम करते रहेंगे (1)

सिद्धि प्राप्त करने हेतु मत लगना डुबकियां पानी में (2)

आम लोगों की तरह जिद मत करना देखा-देखी करने की

सुखी रहना है तो शामिल होना विवेक से सोच समझ कर हर आयोजन में ।

सरकारों के बंदोबस्त पर ज्यादा भरोसा मत रखना,

ये तो अक्सर जागती है हादसे होने के बाद

वैसे भी आसान काम नहीं है अनियंत्रित भीड़ को काबू करना

नई-नई तरकीबे ढूंढ़नी और सीखनी होगी उच्च अधिकारियों को

आप तो भीड़ से बचने के उपाय हमेशा अवश्य सोचते रहना

देश-विदेश की अच्छी जगह पर घूमना जिंदगी का हिस्सा बनाए रखना

लेकिन यात्राएं सदैव अपनी सहूलियत के अनुसार ही करना ।

संदर्भ

  1. जब तक धर्म में पाप धोने की व्यवस्था है लोग पाप धो-धो कर पाप करेंगे। – ओशो
  2. ना सति दुखिआ ना सति सुखिआ ना सति पाणी जंत फिरहि ।
    ना सति मूँड मुड़ाई केसी ना सति पड़िआ देस फिरहि । –
    श्री गुरु ग्रंथ साहिब – रामकली महला १ घरू १ चउपदे , सलोकु म॰ १ ।।१२।।
    भावार्थ -पानी में जलचरों की तरह डुबकियाॅं लगाने में भी जीव को सिद्धि प्राप्त नहीं होती ।

लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत