(छोटी – मोटी सेवा अवश्य करते रहना)

अनेकों घावों से ग्रसित हैंं दुनिया के कई लोग,

कुछ तो मरहम लगाना इनके जख्मों पर

निकल कर “स्व” की सीमाओं से बाहर लगाना सेवा का भोग

इससे घटेगा आपका अहम व समाप्त होगी स्वार्थपरता

स्वार्थपरायण व अहंकार के खत्म होने से मिटते हैं सब रोग ।

धैय रखना हर रोज किसी ने किसी के लिए कुछ अच्छा करना,

सेवा है ऊर्जा का आदान-प्रदान जिसमें छिपा है आनंद असीम

आपको जो सात्विक आनंद दे उन कार्यों को गंभीरता से लेना ।

माता-पिता,बुजुर्गों, गुरुओं व असहायों की सेवा है प्रथम कर्तव्य,

होगी बढ़ोतरी आपकी आयु, योग्यता, प्रसिद्धि और शक्ति में उनके आशीवादों से (1)

जीव सेवा है ईष पूजा व परम दायित्व, जिससे पहुंचोगे अपने गंतव्य ।

सेवा ही है परम सत्य व प्रेम का असली स्वरूप,

अंतरात्मा की शुद्धि के लिए कुछ और नहीं है इसके अनुरूप ।

सेवा से ही मिटेगा अहंकार व नहीं आएंगे कोई भी मनोविकार,

अजनबी और निस्वार्थ भाव की सेवा का पुण्य होता है अपार ।

वास्तविक सुख, दूसरों को सुख देने में है, उनका सुख लूटने में नहीं (2),

जिंदे तो वे ही हैं जो जीते हैं दूसरों के लिए, सिर्फ खुद के लिए नहीं (3) ।

उम्मीद कुछ भी मत रखना उनसे जिनकी सेवा की थी आपने,

वे भूल भी जाएंगे आपको, पर सेवा धूमिल नहीं होगी आपकी

वे ही होंगे लज्जित, आपका सर नहीं झुकेगा किसी के सामने ।

अवश्य याद रखना यह लोकोक्ति “नेकी कर दरिया में डाल”

नहीं होगी दुर्गति अगर लगे रहोगे कल्याणकारी कार्यों में (4)

सेवा है असली कुंजी जो रखेगी आपका जीवन सदैव खुशहाल ।

जरूरी नहीं सेवा के लिए आपके पास हो ऊंचा पद या धन,

किसी को सटीक राय और सांत्वना देने में नहीं चाहिए धन

मदद कर सकते हैं हम दूसरों की चाहे हो हम किसी भी हाल में

हो जाएगी परम सेवा अगर बना लिया कर्तव्य निभाने का मन ।

दुखियों के दुखड़ों को सुनना व उनको समय देना है परम सेवा,

हताश व्यक्ति के लिए सांत्वनामय कोशिश करके बढ़ाना उसका हौसला

ईसा ने कहा था – धन्य हैं जो अपनाते हैं पवित्रता और दरिद्रों की सेवा (5)।

कोशिश जारी रखना स्वयं की भी थोड़ी बहुत देखभाल करने की,

ताकि बनी रहे आपमे क्षमता औरों की सेवा – शुश्रुषा करने की ।

संदर्भ

  1. अभिवादानशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः,
    चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलाम ।। मनु ।।, 121
    भावार्थ – वृद्धों की सेवा करने वाले व्यक्ति की आयु ,योग्यता, प्रसिद्धि और शक्ति अवश्य बढ़ती है । — मुंशी प्रेमचंद
  2. They only live, who live for others, the rest are more dead than alive. – Swami Vivekananda
  3. न हि कल्याणकृत्कश्चिद्द तात गच्छति । – गीता 6 – 40
    भावार्थ – जो मनुष्य कल्याणकारी कार्य (सेवा के कामों) में लगा हुआ है उसकी कभी दुर्गति नहीं होती ।
  4. यीशु का पहाड़ी उपदेश – गरीब लोगों की सेवा और खुद की पवित्रता, यह दो काम ऐसे हैं जिनको तुम मजबूती से पकड़े रहना, इन्हीं से तुम महान बनोगे और धन्य कहलावोगे । – पवित्र बाइबिल – मत्ती (Matthew) – 5

लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत