मानव फितरत व समय बदलते दोनों बेहिसाब,
तकाजा है हम बदले हर क्षण ताकि रहे जमाने के साथ,
न बदलने से बढ़ सकता है तनाव, रह सकते हैं अधूरे हमारे बहुत से ख्वाब।
घर का माहौल हो प्रेममय व करुणा से ओत-प्रोत,
ताकि बना रहे हरेक का जीवन आनंद का स्रोत।
दो निर्मल पारम्परिक सीख ताकि बने रहो महावीर,
करो सेवा माँ-बाप व दरिद्रों की, बनो परोपकारी अपनी हैसियत के अनुसार
इनकी कमी से हो जाते हैं ढेर सब शूरवीर
कहीं भी चूके तो सूख जायेगा अपनी चक्षुओं का नीर।
घर का परिवेश ही है परम विद्यालय,
हर पीढ़ी के लिए नहीं था इससे महान कोई आलय।
वर्तमान में यह माहौल बन गया मुख्य धुरी,
हर कोई है घर में, एक छत के नीचे
प्रत्येक सदस्य चाहता अपनी सब कामनाएं करना पूरी
प्यारे अभिभावकों सम्भलों वर्ना रह जायेगी भविष्य की बहुत सी कामनाएं अधूरी।।
बच्चे सीखते हैं अभिभावकों के आचरण से,
क्या उम्मीद रखेंगे झगड़ालू, अनैतिक व्यस्क अपनी संतानों से।
जरुरी नहीं संताने माने आपका हर आदेश,
हो सकता है अनुपयुक्त, घिसा-पिटा आपका उपदेश
गुस्से में मत कर देना जारी कोई अध्यादेश।
सुनना, होती हैं उनकी भी कुछ अभिलाषाएं,
आसान नहीं यह काम, लेते रहना विशेषज्ञों की राय
समय-समय पर जरूर आंकना बच्चों की समस्त क्षमताएं।
ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)
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