बचपन व जवानी के मध्य का वक्त है बेहद महत्वपूर्ण,
नहीं कह सकते उसे बालक, न व होता व्यस्क पूर्ण
अभिभावक सतर्क रहे वरना बिखर जायेगा बच्चों का जीवन सम्पूर्ण।
दोष नहीं किशोरों का, होते हैं बहुत शारीरिक व अंत: – स्त्रावी बदलाव,
हो सकते हैं भावनात्मक रूप से असंतुलित
करते रहते हैं कुछ गलतियां बिना देखे हाव-भाव।
ज्यों-ज्यों बीतता बचपन, चढ़ने लगती है जवानी की खुमारी,
पनपता स्वाभाविक यौन-आकर्षण जो होता है समय पर जरुरी
इसे रखना होगा नियंत्रित, वरना बन सकती है महामारी
अगर बह गये इसके वेग में तो रह जायेगी जिंदगी अधूरी।
कामुकता तो कर देती है धराशायी कई परिपक्व योद्धाओं को,
नजर पैनी कर सतर्क रहना होगा अभिभावकों को
करेंगे बच्चे अटपटी गलतियां, माफ़ करना तुरंत उनको।
घर का माहौल रखना सम्पूर्ण सौहार्दपूर्ण व मित्रवत,
ताकि हिचके नहीं किशोर अपनी दुविधाएं बताते वक्त।
प्यार से सुनना व सुनाना ही होगा सटीक-उपाय आज,
दम-ख़म व उपदेश नहीं होंगे ज्यादा कारगर
किशोरों से अर्ज है अभिभावकों की राय को रखना सर्वोपरि
मत शर्माना, बताना उनको दिलों के सारे राज
स्नेह युक्त आदेश मान लेना, सुनना उनकी अंतरात्मा की आवाज
चूक गये तो जरूर होगा पछतावा व पड़ेगी भयंकर गाज।
दूर रहना गलत संगत से करना इज़्ज़त बुजुर्गों, शिक्षकों व समय की,
पालन करना बृह्मत्व का, यही सब है नींव आपके भविष्य की,
मत करना जल्दबाज़ी विपरीत लिंगी से घनिष्ठता की
मन है बावला, बनाता है योजनाएं बेतुकी
कतई मत पड़ना इन झमेलों में गृह्स्ताश्रम के पहले
धीरज रखना समय आने पर सब कामनाएं पूर्ण होंगी आपकी
जरूर मिलेगी आपको भी सही प्रति पद्मिनी की।
केंद्रित रहना ज्ञान अर्जन व कौशल विकास पर,
याद रखना मनीषियों की शिक्षा
मत भटकने देना मन को व्यर्थ के कामों पर
जरा मुश्किल होगा पर है नहीं नामुमकिन
जरूर ध्यान देना ताकि पछताना ना पड़े समय निकल जाने पर।
ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)
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