माया के बारे में कुछ कहना, लिखना नहीं है आसान काम,
माया शब्द, कई गूढ़ार्थ समेटे हुए हैं स्वयं में
अचरज घटनाओं को भी देते आए हैं माया का ही नाम ।
उस शक्ति को भी कहते हैं माया जो सब कुछ करने में है समर्थ,
प्रकृति व ब्रह्म के रूप को भी माना जाता है विद्या माया
माया का ‘अविद्या’ रूप ही करता है मानव को पथभ्रष्ट
दूर रहना अविद्या से, समझ कर इसका सही अर्थ ।
इस माया का आवरण कर देता है हमारे ज्ञान को आच्छादित (1)
इसका जादू अक्सर बिगाड़ देता है काम-काज महापुरुषों का
यह कर देती है मानव को प्रभु की सच्ची भक्ति से वंचित (2)
यही है सबसे बड़ी दुश्मन हमारी प्रसन्नता और सफलता की,
मानव की राक्षसी वृति से गहरा संबंध है अविद्या माया का
अविद्या माया ही है जननी मोह, राग, द्वेष, काम और क्रोध की ।
कराती है सारा खेल हमारे मन के भटके हुए गलत विचारों से
इससे तो बच पाओगे सिर्फ सत्य, सत्कर्म व सुविचारों से,
रखना मन पर काबू ताकि बच सको अविद्या के कुचक्रों से ।
संदर्भ
- ढक देना
- श्रीमद्भगवद गीता 7-15
न मां दुष्कृतिनों मूढाः प्रपघन्ते नराधमा:।
माययापहृतज्ञानाआसूरं भावमाश्रिता: ।।
भावार्थ – अधम (बुरी) माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चूका आसूर स्वभाव वाले मेरी भक्ति नहीं कर पाते हैं ।
लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत
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