व्याकुल मनुष्यों की भीड़ व उम्रदराज होती आबादी
मानव शांति से कभी नहीं बैठा,वर्तमान में है अत्यधिक अशांत
अनेक उपलब्धियों के बाद भी उसकी फितरत नहीं सुधरी
अनगिनत कारण हैं इसके व अछूता नहीं है कोई भी प्रांत ।
शीर्ष पर पहुंची हुई वैज्ञानिक उन्नति के बावजूद,
संकट में है सम्पूर्ण सृष्टि, मानवता व जीव जंतु का वजूद ।
विकराल रूप है बढ़ती जनसंख्या व बिगड़ते पर्यावरण का,
भीड़ लग रही है हर उन्नत देश की सीमाओं पर शरणार्थियों की
वर्णित नहीं किया जा सकता बेहाल इन विस्थापित परिवारों का
चिंताजनक हालातों में रहने को मजबूर होगें अनेक शरणार्थी
बहुत जल्द ही कष्ट झेलना पड़ेगा बढ़ती बुजुर्गों की आबादी का
शिक्षा , धर्म, नेता ,अधिकारी ,जनता व पर्यावरण
योग्य शिक्षकों की कमी ने अंधेरे में धकेला है भविष्य बच्चों का
शिक्षकों को सीखने होंगे गुर, अध्यापन विज्ञान शिक्षा के
जोर नहीं है कौशल व नैतिक शिक्षा पर, कैसे होगा भला उनका ।
विकृत मानसिकता के धर्म प्रचारकों ने भी मचा रखी है तबाही ,
धर्म है उजाला फैलाने कै, होड़ मची है इसे धर्मान्ध बनाने की
कई न्याय के देवता व सोशल मीडिया वाले भी नहीं है सही ।
पथभ्रष्ट अधिकारी व चिकित्सकों ने कर रखा है बुरा हाल,
सिरफिरे नेता व अंधभक्तों ने कर रखा है समाज का बेहाल ।
इन्हें हैं सत्ता हासिल करने की महारत व राज्य विस्तार का रोग,
लगता है हमारे समाज के सब स्तंभों को लग गई है दीमक
काट रहे हैं हमारे पैर ,स्वार्थी व गलत सोच वाले लोग ।
दुखदायी है हवा सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण की,
ऐसी ही गलत सोच से होते हैं भयंकर युद्ध
बर्बरीकरण से ग्रस्त राष्ट्र से कैसे उम्मीद रखेंगे स्वस्थ समाज की
हर जगह है हाहाकार, गरीब लोग झेल रहे हैं मार बेरोजगारी की
बन रहे हैं खतरनाक हथियार, हो रहा है अर्थ का बेहद विनाश
विश्व की आधी आबादी को चिंता है दो वक्त की रोटी की
खत्म हो जाता है वह समाज जो उपेक्षा करता है गरीबों की
वर्तमान में स्वार्थपरता, तनाव, गुस्सा व उदासी है चरम सीमा पर
झगड़ते हैं भाई-भाई, बच्चे झेलते हैं मार पारिवारिक कलह की
समस्याएं और भी बहुत आएंगी कुछ होंगी कल्पना से बाहर
सावधान नहीं रहे तो झेलनी पड़ेगी मार कृत्रिम बुद्धि की
कोहराम और मचेगा मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से
मचेगी हाय- हाय, भरमार होगी मानसिक तनाव की
जल व वर्षा की कमी से और बिगड़ेंगे खेती व गांवों के हाल
भयंकर मार झेलनी पड़ेगी शहरों को बेकाबू होती भीड़ की ।
समाधान
इन विपदाओं के होते हुए भी हमें नहीं होना है हताश,
मैंने तो जला रखी है आशा की अनेक फुलझड़ियाॅं
समाधान हम ही खोजेंगे, नहीं आएगा कोई एलियन आसपास ।
बदलेगें, भटके हुए नागरिकों की सोच सही शिक्षा के माध्यम से,
आसानी से नहीं चढ़ेगा रंग इन पके हुए घड़ों पर
पकड़ना होगा उन्हें जो भटकाते हैं इन्हें, अपने विकृत विचारों से
अचरज भी है व दया भी आती है मुझे इन पाखंडियों पर
यह बाज नहीं आते हैं धर्मग्रंथो के सत्य को झूठलाने से,
समझाना होगा प्यार से, गर नहीं माने तो बनाने होंगे सही नियम
जरूरत हुई तो करानी होगी सही कानूनों की पालना सख्ती से
चुनना होगा हमें सही नेता इन सब कार्रवाइयों के लिए
दरकिनार करेंगे उनको जो जनता का धन उड़ाते हैं बेहिसाब से
यह संभव होगा अगर हम नाता तोड़ लेंगे गलत लोगों से ।
ध्यान दे ना उन पर जो दे रहे हैं बच्चों को संकीर्णता की शिक्षा,
वर्तमान में आसान है यह जानना, कौन क्या पढ़ा रहा है
नहीं सुधारा इनको तो जरूर मांगेगी हमारी भावी पीढ़ी भिक्षा
तोड़नी होगी दीवारें बेतुके धर्म, जातिवाद, संप्रदाय व पंथों की
कारगर सुझाव एक ही है – सही शिक्षा, शिक्षा, शिक्षा।
ज्यादा लोग शिक्षा से दूर रहेंगए तो दुनिया असुरक्षित ही रहेगी,
जलवायु, वातावरण व प्रकृति पर भी ध्यान देना है जरूरी
वायु है जीेवन, इसकी शुद्धता बरकरार रखनी होगी
जगत को जहरीला बनाने वाली हर क्रिया पर रोक है जरूरी
हर तरह के वातावरण की गुणवत्ता बनाए रखनी होगी ।
हम सबको उठानी होगी जिम्मेदारी, यही है मुख्य मुद्दा,
खुद का ही नहीं पूरे समाज व विश्व का रखना होगा ख्याल
इसी से होगा जीवन सफल, और आप अवश्य बन जाएंगे बुद्धा ।
लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत
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