सृष्टि पर है स्वर्ग, जरूरत है आंखें खोलकर निहारने की,

हरी- भरी धरती पर रंग-बिरंगे फूलों की है भरमार यहां

हैं यहां रसीले फल, कमी नहीं है हर तरह के भोजन की

इठलाती नदियों की पनिहारी मिलेगी यहां शुद्ध पानी लाने को

चीत्ताकर्षक छवि निहारना पर्वत के सीने से झरते झरनों की

विशालकाय समुद्र में उठती है ऊॅंची- ऊॅंची मनोहर लहरें

सुबह-शाम होड़ होती है चंदा-सूरज में अनुपम अठखेलियां करने की ।

रवि से चुरा कर लाता है चंदा मामा धरती पर रमणीय चांदनी,

देखना जब शशि करता है बादलों में आकर्षक छुपा-छुपी

अध्भुत छटा बनती है जब पड़ती है बर्फीली चोटियों पर रवि-शशि की रोशनी ।

फूलों की मनभावन सुगंध का आनंद लेती रंग बिरंगी तितलियां,

एक से एक सुन्दर पशु-पक्षी है यहां सुनी होगी कुहक कोयल की

उत्तम दृश्य होता है जब समुद्र में तैरती दिखती है मछलियां

दिखता है अनूठा वन्य जीवन का खिलवाड़ अरण्य में

सुहावनी लगती है कतार में चलती चीटियां व फूलों पर भिनभिनाती मधुमक्खियां ।

कोई कमी नहीं छोड़ी है सृष्टि रचयिता ने इसे देवलोक बनाने में,

हम ही गलती कर बैठते हैं इसका असली रूप पहचाननें में ।

गर निभा सको तो कमी नहीं है गहरे आनंदमय रिश्तो की,

सदैव ध्यान रखना सृष्टि है जननी हर जीव-जंतु की

कल्पना भी नहीं की जा सकती इसके योगदान के बिना किसी भी जीव के अस्तित्व की ।

संकट और भी झेलने पड़ेंगे अगर ध्यान नहीं रखा मां प्रकृति का,

अब समय आ गया है, हम प्रण लें लें प्रकृति के रख-रखाव का ।

लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत