आलोचक को सकारात्मक तरीके से ठीक से सुनना,

आलोचना के सत्य और तथ्य को समझना ।

आलोचना करती है आपको दर्पण दिखाने का काम,

सच्चे आलोचक से हो जाती है उजागर हमारी कमियां तमाम

यह होते हैं हमारे भला चाहने वाले

यह निखार लायेंगे हमारे हुनर में व सुधरेंगे हमारे सब काम।

रखना इनको आस-पास, यही थी महात्मा कबीर की राय (1)

मिथ्या निंदा करने वालों से कभी भी मत उलझना,

आलोचना का जवाब शालीनता और तटस्थता से देना

फायदे में रहोगे अगर कोई नहीं की आपने प्रतिक्रिया

मुस्कुराते हुए उनसे हाथ जोड़ लेना

अपने व्यव्हार की निष्पक्ष समीक्षा करने का साहस रखना

सही आलोचना को बिना आक्रोश के सहन करना (2)

थोड़ा सा भी हो सत्य निंदा में तो सुधार जरूर करना ।

मत करना किसी भी हालत में, किसी की भी निंदा

हर मानव में अच्छाइयां अवश्य होती है उन्हें जरूर बताना

महापाप, महाभय व महादुख है परनिंदा (3)

सन्दर्भ

  1. निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय,
    बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय
    – कबीर
  2. जो जीवनदायी डांट मन लगाकर सुनता है, वह बुद्धिमानों के संग ठिकाना पाता है ।
    – पवित्र बाइबिल – नीतिवचन, 15:31
  3. परनिंदा महापापं, परनिंदा महा भयम ।
    परनिंदा महत्त दुःख, न तस्या: पातकं परम ।।
    – स्कन्द पुराण – ब्रा. चा. मा. 4:25

लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत