(राहत के भवनों में गफलत हो सकती है)
भव्य इमारतो में विराजमान है कई पूजनीय न्यायमूर्ति,
चक्कर बहुत लगाने पड़ते हैं इनसे मामूली न्याय लेने में भी
मामला जटिल है की उम्र बीत जाती है करते-करते खाना पूर्ति
कुछ न्यायालयों से राहत की किरणों से अवश्य मिलती है आपूर्ति ।
अक्सर न्याय बहुत सरल और स्पष्ट दिखता है,
प्रणाली जटिल है, यह बढ़ा देती है राहत लेने वालों की मुश्किलें
प्रारंभिक जांच जो है जड़ मुक़दमे की, उसमें कमी रह जाती है ।
दोषी इस नींव को नष्ट करने की करता है पूरी कोशिश,
बिगड़ जाता है मामला, जज हो जाता है मजबूर
पलटा देते हैं मामला प्रतिष्ठित वकील लोग लेकर भारी फीस ।
गरीब बेगुनाह को कैसे हासिल होगा सही न्याय,
कहते हैं ‘कानून की नजरों में सब होते हैं बराबर’
नहीं है यह सत्य, गरीबों के साथ कई बार होता है अन्याय ।
‘तुम मुझे आदमी दिखाओ मैं तुम्हें नियम दिखाऊंगा’ (1),
फिजूल की मजबूरियों से घिरे रहते हैं अनेक जज महोदय
कह देते हैं आसानी से, फैसला अगली सुनवाई पर होगा ।
चलते रहते हैं मामले कई पीढ़ियों तक,
जहां जनता भोली, लालची, अनभिज्ञ व मतलबी होती है
ऐसे माहौल में पहुंच जाते हैं आरोपी विधायक व सांसद जैसे ऊंचे पदों तक ।
कैसे भरोसा और उम्मीद रखेगा साधारण आदमी इन लोगों से,
अब ध्यान देना हो गया है जरूरी कार्यपालिका व विधायकों पर
न्यायपालिका और पुलिस को भी भरना होगा कर्मठ लोगों से
समय सीमा तय करनी होगी गंभीर मामलों के निपटारों की
न्याय में देरी अन्याय है सब वाकिफ है इस तथ्य से (2)
अधिकतर जेलें भरी हुई है विचाराधीन कैदियों से ।
न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या है करोड़ों में,
न्यायाधीशों के पदों में बढ़ोतरी से अवश्य घटेगी इनकी संख्या
कमी कभी भी ना रहे पारदर्शिता की न्यायिक व्यवस्था में
मेरी समझ से परे है न्यायाधीशों की चयनित व्यवस्था की
है कुछ खामियां वर्तमान प्रणाली में
राय लेनी होगी महानुभावों की जो है प्रवीण इन मामलों मे
न्यायपालिका को कोसना छोड़कर न्यायिक सुधार करने होंगे
पुलिस एवं न्याय व्यवस्था से जुड़े हर विभाग में
हम सब व समाज की जिम्मेदारियां भी नहीं है कम
इन्हीं उपायों से अवश्य कमी होगी मुकदमों की भरमार में ।
- You show me the person and I will show you the rule- (English proverb).
- Justice too long delayed is justice denied-Martin Luther King jr, 1963
लेखक – लेफ्टिनेंट जनरल (डॉक्टर) शिवराम मेहता, सेवानिवृत
Leave a Reply