मन, मस्तिष्क में है मोहक व असीमित क्षमता,
मन व दिमाग है अलग-अलग जुड़वा भाई,
दोनों के सामंजस्य के बिना पत्ता भी नहीं हिलता।
सवाल उठता है – क्या मन व मस्तिष्क है अलग?
प्रश्न है जटिल व वाजिब, उत्तर है बेहद सरल,
दिमाग है भौतिक वस्तु, अदृश्य है मन,
मानो या ना मानो यह दोनों है व हैं अलग-थलग
सनातन धर्म नहीं मानता मन और आत्मा को अलग।
चिकित्सक के नाते पेश है एक सिद्धांत,
मस्तिष्क में चलते हैं दो सामानांतर सोच-विचार,
नहीं जानता मैं, कहाँ है इनका प्रारम्भ व अंत।
ईमानदारी व ज्ञानमय सोच विचार का केंद्र है मन में,
विकृत प्रवृति भी मौजूद है वहीँ पर,
इस दूषित रुझान को रोकना हर हालत में,
गर कर लिया यह तो आप विजेता हैं इस लोक में,
बिगड़े हुए मन को भी सुधारता है मन ही
मन जरूर बताता है क्या है गलत व क्या सही
इच्छा, विचार, विवेक सब उत्पन्न होते हैं मन में,
मन ही नियंत्रण करता है सब क्रियाएं तन में।
निष्कर्ष – मत भटकने देना मन को सही राह से,
करना है इसे प्रबल ध्यान व योगाभ्यास से
रखना मन में दया, प्रेममय सेवा व सकारात्मक भाव,
होकर नियंत्रण नहीं कराएगा मन गलत काम आपसे
आपके सही बर्ताव व सोच को देखकर
आप की संताने भी सीख लेगी यह हुनर आपसे।
जीवन में इसके अलावा कुछ नहीं चाहिए हमको,
यह करते ही, आराम से छोड़ पाओगे दुनिया को।
ले. जनरल (डॉ.) शिवराम मेहता (रिटायर्ड)
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